aamukh katha

  • Aug 16 2019 1:19PM

मछली पालन से समृद्ध हो रहे हैं किसान

मछली पालन से समृद्ध हो रहे हैं किसान

पवन कुमार

मछली पालन के क्षेत्र में झारखंड आत्मनिर्भर बन गया है और निर्यात की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है. नीली क्रांति की ओर राज्य के कदम बढ़ रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों में मत्स्य पालन को लेकर किसान जागरूक हुए हैं. सरकारी मदद और जागरूकता के कारण अब किसान पूर्णकालिक रोजगार के तौर पर इससे जुड़ रहे हैं. राज्य में वर्ष 2018-19 में दो लाख आठ हजार 450 मीट्रिक टन मछली का उत्पादन हुआ. वहीं, वर्ष 2019-20 के लिए दो लाख 30 हजार मीट्रिक टन उत्पादन लक्ष्य रखा गया है. पूरे राज्य में लगभग एक लाख 32 हजार महिला और पुरुष मछली पालन कर रहे हैं. राज्य की 70 फीसदी आबादी को मछली खाना पसंद है.

प्रशिक्षण व सरकारी मदद
नयी तकनीक के माध्यम से मत्स्य उत्पादन में तेजी लाने का प्रयास किया जा रहा है. किसानों को प्रशिक्षण के जरिये उचित तालाब प्रबंधन समेत अन्य जानकारी दी जाती है. वैज्ञानिक पद्धति से सघन मछली के बीज का उत्पादन किया जा रहा है. केज कल्चर और आरएफएफ के माध्यम से उत्पादन में अच्छी वृद्धि दर्ज की गयी है. मत्स्य पालकों को मत्स्यजीवी सहयोग समिति के जरिये अनुदान पर केज व आरएफएफ के लिए आधारभूत संरचनाएं उपलब्ध करायी जाती हैं. इसके साथ ही जीरा उत्पादन में तेजी लाने के लिए किसानों को प्रशिक्षण दिया जाता है और उन्हें अनुदानित दर पर पोर्टेबल हेचरी दिये जाते हैं.

दो लाख 30 हजार मीट्रिक टन मछली उत्पादन का लक्ष्य
वर्ष 2018-19 में दो लाख 25 हजार मीट्रिक टन उत्पादन लक्ष्य के मुकाबले दो लाख आठ हजार 450 मीट्रिक टन का उत्पादन हुआ. वर्ष 2019-20 के लिए दो लाख 30 हजार मीट्रिक टन उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है. वहीं जीरा उत्पादन में वर्ष 2019-20 में एक हजार करोड़ का लक्ष्य रखा गया है.

राज्य में मछली उत्पादन की स्थिति
वित्तीय वर्ष                                        उत्पादन (मीट्रिक टन में)
2015-16                                           1,16,000
2016-17                                           1,45,142
2017-18                                           1,90,00
2018-19                                           2,08,450
2019-20                                           2,30,00 (
लक्ष्य)

सरायकेला में लक्ष्य से अधिक उत्पादन
वित्तीय वर्ष 2018-19 के तहत मत्स्य उत्पादन में राज्य का सरायकेला-खरसावां जिला सबसे आगे है. मत्स्य विभाग की ओर से जिले में 18 हजार 200 मीट्रिक टन मछली उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, लेकिन इससे अधिक 18 हजार 500 मीट्रिक टन मछली का उत्पादन हुआ. वहीं, गढ़वा में 3600 मीट्रिक टन के मुकाबले 3550 मीट्रिक टन ही मछली का उत्पादन हो पाया.

जिलावार मत्स्य उत्पादन की स्थिति (सभी आंकड़े मीट्रिक टन में)
जिला                                     लक्ष्य                                      उत्पादन
सरायकेला                                 18,200                                  18,500
धनबाद                                     14,000                                   13,400
साहेबगंज                                   12,500                                   12,500
बोकारो                                      14,000                                   12,000
जमशेदपुर                                   11,900                                   11,000
रांची                                          12,000                                   10,800
चाईबासा                                     11,300                                   10,750
गुमला                                          9,500                                      9,400
दुमका                                         10,800                                     9,400
हजारीबाग                                    11,800                                     9,000
गोड्डा                                        10,800                                     9,000
देवघर                                          8,600                                      8,700
जामताड़ा                                      8,000                                      8,050
पाकुड़                                          9,200                                      8,000
चतरा                                           8,000                                      7,900
कोडरमा                                      11,000                                     7,600
लातेहार                                         7,300                                    7,350
गिरिडीह                                         7,300                                    6,900
रामगढ़                                           6,600                                    6,900
सिमडेगा                                         5,200                                    5,250
पलामू                                            4,450                                    4,400
लोहरदगा                                        4,000                                    4,000
खूंटी                                              4,950                                   4,100
गढ़वा                                              3,600                                  3,550
कुल                                          2,25,000                            2,08,450

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जलाशयों की संख्या और क्षेत्रफल
संख्या                                       क्षेत्रफल (हेक्टेयर में)
निजी तालाब 1,16,305                     50,586
सरकारी तालाब 16,719                    15,762
डैम 401                                         1,21,117
चेक डैम एवं आहर 1,184                    4570
कोल पिट्स एवं माइंस1,741                 9,880
नदी 1800 किमी
डोभा 2,04,000(लगभग)
आरएफएफ 1153 यूनिट

केज के माध्यम से मछली उत्पादन का लक्ष्य
मत्स्य विभाग ने मिशन 2020 के तहत वर्ष 2020-21 में 12 हजार केज से 50 हजार मीट्रिक टन मछली उत्पादन की योजना बनायी है.

वर्ष                          केज की संख्या                        लक्ष्य (मीट्रिक टन में)
2016-17                  4
हजार                                              12 हजार
2017-18                  7
हजार                                              21 हजार
2018-19                  9
हजार                                              27 हजार
2019-20                 10
हजार                                             30 हजार
2020-21                 12
हजार                                             50 हजार

मत्स्य पालकों की समस्याएं
पुराने तालाबों में गाद एवं जलीय पौधों का जमा होना
मौसमी तालाब रहने के कारण मछलियों का समुचित विकास नहीं होना
आधारभूत संरचनओं का अभाव
संगठित बाजार का अभाव
फ्लोटिंग फीश फीड निर्माण के लिए स्थानीय स्तर पर मकई और सोयाबीन की कमी
लेटेराइट एवं अम्लीय मिट्टी का होना

मत्स्य मित्रों की भूमिका सराहनीय
राज्य में लगभग 7,500 मत्स्य मित्रों को जीरा उत्पादन और मछली पालन का प्रशिक्षण दिया गया है, जो स्थानीय स्तर पर कार्य कर रहे हैं. इससे स्थानीय स्तर पर बीज मिलना शुरू हो गया है. इससे छोटे तालाब और डोभा के मालिक भी मछली खरीद कर मत्स्य मित्रों के सहयोग से बेहतर उत्पादन कर रहे हैं. मत्स्य मित्रों के सहयोग से किसान तालाब का उचित प्रबंधन कर रहे हैं. चारा आधारित मछली पालन की ओर बढ़ रहे हैं. जैविक खाद का इस्तेमाल हो रहा है और जिंदा मछली आज राज्य के बाजारों में उपलब्ध है.

नयी तकनीक का उपयोग
1.
आरएएस(रिस्कुलेटिंग एक्वाकल्चर सिस्टम) : इस प्रणाली में कृत्रिम टैंक बनाकर मछली पालन किया जाता है. इसमें मोटर की आवश्यकता होती है, जहां पानी घूमता रहता है. इस प्रणाली में एक क्यूबिक मीटर क्षेत्रफल में 70-80 किलो मछली का उत्पादन होता है.

2. पर्ल कल्चर : पर्ल कल्चर के जरिये किसान मोती पालन भी कर रहे हैं. कृत्रिम मोती बाजार में आ गयी है और इसके दाम भी अच्छे मिलते हैं.

3. इंडियन मेजर कार्प (रेहू, कतला, मृगल) के अलावा मांगूर, कबई व अन्य मछलियों का पालन और ब्रीडिंग किया जा रहा है.

4. रंगीन मछली के प्रशिक्षण और पालन पर जोर दिया जा रहा है. इसके जरिये भी किसानों को आमदनी हो रही है.

झास्कोफिश की भूमिका
मत्स्य उत्पादन में बढ़ोतरी के लिए झास्कोफिश की भूमिका महत्वपूर्ण है. सभी मत्स्यजीवी सहयोग समितियों को संगठित कर उनकी समस्याओं को दूर करने का काम करता है. साथ ही समितियों को आधुनिक तकनीक की जानकारी देकर उन्हें तकनीकी तौर पर सशक्त भी करता है. उन्हें सरकारी योजनाओं से जोड़ कर उनकी आय बढ़ाने, समितियों के लिए बेहतर बाजार की उपलब्धता, समितियों को मजबूत करने और उनके लिए आधारभूत संरचनाओं का विकास करना मुख्य है.

सरकारी योजनाएं
1.
प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना : इस योजना के जरिये सभी सक्रिय मछुआरों को लाभ मिलेगा
2.
मत्स्य कृषक प्रशिक्षण : आवासीय प्रशिक्षण के तहत राज्य स्तर पर मत्स्य किसान प्रशिक्षण केंद्र, धुर्वा में दो दिवसीय और पांच दिवसीय प्रशिक्षण दिया जाता है
3.
वेद व्यास आवास योजना (राज्य योजना) : योजना के तहत गरीब एवं कच्चे मकानवाले सक्रिय मछुआरा बहुल इलाके में समूह में 10 या अधिक वेद व्यास आवास (पक्का ) निर्माण कराया जाता है
4.
विभागीय मत्स्य बीज वितरण : विभागीय मत्स्य प्रक्षेत्रों में मत्स्य बीज का उत्पादन किया जाता है. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के मत्स्य कृषकों को 80,000 मत्स्य बीज खरीदने पर 20,000 मत्स्य बीज अनुदान पर दिया जाता है
5.
मत्स्य बीज उत्पादकों को मत्स्य बीज वितरण के लिए अनुदान
6.
जलाशय के छाड़न में मत्स्य स्पॉन का संवर्धन और संचयन
7.
जलाशयों में मत्स्य अंगुलिकाओं का संचयन
8.
नदियों के छाड़न में स्पॉन का संचयन
9.
रियरिंग तालाब निर्माण योजना
10.
तालाबों का सर्वेक्षण
11.
मोबाइल रिचार्ज कूपन की प्रतिपूर्ति
12.
बीज उत्पादकों के लिए कार्यशाला
13.
मत्स्य कृषक गोष्ठी
14.
प्रगतिशील मत्स्य कृषकों, मत्स्य बीज उत्पादकों, मत्स्य मित्रों को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए पुरस्कार
15.
तालाबों, जलाशयों की मिट्टी, पानी की जांच
16.
मत्स्य विपणन योजना
17
रिवराइन फिश फार्मिंग

मछली पालन से ऐसे जुड़िए
जो किसान मछली पालन करना चाहते हैं, वे अपने जिला मत्स्य कार्यालय में जाकर संपर्क कर सकते हैं. इसके बाद उन्हें रांची में तीन दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण दिया जाता है, जो नि:शुल्क होता है. अधिक जानकारी के लिए इस नंबर पर संपर्क कर सकते हैं, मुख्य अनुदेशक, मत्स्य प्रशिक्षण केंद्र (धुर्वा)- 9431089896, 06512440563

बारिश के पानी का संचय करें और कमाएं मुनाफा : एचएन द्विवेदी
मत्स्य निदेशक एचएन द्विवेदी कहते हैं कि मछली पालन के लिए पानी बेहद जरूरी है. बारिश जल का संरक्षण जरूर करें. मछली पालन में मुनाफा कमाने के लिए पुरानी पद्धति को छोड़कर आधुनिक तरीकों को अपनाएं. चारा आधारित मछली पालन कर किसान अच्छी आय कर सकते हैं. तालाब में चूना का प्रयोग जरूर करें. बढ़िया बीज पर्याप्त मात्रा में डालें. हमेशा मछलियों की देखरेख करें. अपने क्षेत्र के मत्स्य मित्र के संपर्क में रहें. प्रशिक्षण के दौरान दिये गये दिशानिर्देशों का पालन अवश्य करें.