aamukh katha

  • May 20 2019 12:45PM

इज्जत घर से बढ़ी आधी आबादी की इज्जत

इज्जत घर से बढ़ी आधी आबादी की इज्जत

गुरुस्वरूप मिश्रा

पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था के सामाजिक ताने-बाने में हमेशा हमारी मां-बहन-बेटियां हाशिए पर रही हैं. मौसम की मार झेलते हुए खुले में शौच जाने के लिए हर रोज तड़के सुबह उठ जाने की बेबसी हो या रात के अंधेरे का बेसब्री से इंतजार करने की लाचारी हो. दोपहर में खुले में शौच जाने का तो वह सोच भी नहीं सकती हैं. अलसुबह या फिर रात में घर से बाहर अकेले जाकर शौच करना भी उनके लिए काफी खतरनाक साबित हुआ है. कई मां, बहन व बेटियां खुले में शौच करने के दौरान ही दुष्कर्म की शिकार हो गयी हैं. अगवा कर उनकी हत्या तक कर दी गयी है. मानसिक तनाव, सामाजिक दबाव और असुरक्षा के बीच शौचालय यानी इज्जत घर से इनकी इज्जत बढ़ गयी है.

हाड़ कंपाती ठंड हो, गर्मी हो या बरसात. सालोंभर महिलाओं को घर में शौचालय के अभाव में खुले में शौच जाने के लिए वही पुराने ढर्रे पर चलने की मजबूरी थी. सुरक्षात्मक दृष्टिकोण से समूह में उनके खुले में शौच जाने की अकथ्य पीड़ा का अंदाजा लगाया जा सकता है. सच कहिए, तो महिलाओं की इन परेशानियों की कभी किसी ने सुध भी नहीं ली. अब घर में अपना शौचालय है. आधी आबादी को मिली इस बेइंतहा खुशी का आप आंकलन कर सकते हैं.

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रुढ़िवादी व्यवस्था को दिखाया आईना
महिलाओं की बेइंतहा पीड़ा को कभी दर्द समझा भी नहीं गया. पूरे परिवार की हमेशा सुध लेने वाली मातृशक्ति बिना शिकवा-शिकायत के असहनीय पीड़ा सहती रही. कभी उफ्फ तक नहीं की. सच कहें, तो गांव-जवार में पहले खुले में शौच जाना सामान्य बात थी. इसकी जरूरत कभी समझी ही नहीं गयी. आर्थिक तंगी भी बड़ी वजह थी. यातनाओं का पहाड़, लेकिन शर्म-हया का गहना बनाकर उनकी जिंदगी से खिलवाड़ कर रही रुढ़िवादी व्यवस्था को स्वच्छ भारत अभियान (ग्रामीण) के तहत बने शौचालयों ने आईना दिखा दिया. हर वर्ष 19 नवंबर को विश्व शौचालय दिवस मनाया जाता है.

खुले में शौच नहीं था आसान
वाटर एड और डीएफआइडी द्वारा वर्ष 2011 में दिल्ली के भलस्वा और सुंदर नगरी की झुग्गी-झोपड़ियों में कराये गये सर्वेक्षण में बताया गया था कि सार्वजनिक शौचालयों का उपयोग करने के दौरान 10 साल से कम उम्र की लड़कियों को दुष्कर्म का सामना करना पड़ता है. खुले में शौच जाने पर कई बार दुष्कर्म करने की कोशिश की जाती है. झारखंड के हालात भी इससे अलग नहीं थे.

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घरों में शौचालय होता, तो नहीं होता दुष्कर्म
पहले खुले में शौच करने के दौरान दुष्कर्म व यौन उत्पीड़न की अक्सर घटनाएं घट जाती थीं. कई अध्ययन बताते हैं कि शौचालय के अभाव में खुले में शौच जाने पर महिलाएं यौन हिंसा की ज्यादा शिकार हुई हैं. आंकड़े गवाही देते हैं कि अगर इनके घर में शौचालय होता, तो ये दुष्कर्म की शिकार होने से बच जातीं. गरीब-बेबस परिवारों को इसकी ज्यादा कीमत चुकानी पड़ी है.

रानी मिस्त्री ने दिखाया कमाल
स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) की सफलता में झारखंड की रानी मिस्त्रियों की अहम भूमिका रही है. मिथक तोड़ दीदियों ने राज मिस्त्री का हुनर सीखा. प्रशिक्षण के बाद उन्होंने काफी संख्या में शौचालयों का निर्माण किया. कई रानी मिस्त्रियों को सम्मानित किया गया है. लातेहार की रानी मिस्त्री सुनीता देवी को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया है.

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16 फीसदी घरों में थे शौचालय
झारखंड के गांवों में दो अक्तूबर 2014 तक महज 16.25 फीसदी घरों में ही शौचालय थे. बड़ी आबादी खुले में असुरक्षित शौच करने को मजबूर थी. महज साढ़े चार सालों में ही झारखंड खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) घोषित हो गया.

वित्तीय वर्ष                                        शौचालय निर्माण (फीसदी में)
2014                                                          16.25
2015-16                                                     25.78
2016-17                                                     46.60
2017-18                                                     76.74
2018-19                                                     100

33,44,811 शौचालयों का हुआ निर्माण (दो अक्तूबर 2014 से अब तक)
83.75
फीसदी वृद्धि हुई घरों में शौचालय निर्माण में
24
जिले ओडीएफ घोषित हो चुके हैं राज्य में
4,396
ग्राम पंचायत ओडीएफ घोषित
29,564
ओडीएफ गांव

11 दिनों में बने रिकॉर्ड एक लाख शौचालय
स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत वर्ष 2018 में झारखंड को खुले में शौच से मुक्त घोषित करने के लिए 26 जनवरी से 25 फरवरी तक स्वच्छता संकल्प अभियान चलाया गया. इस दौरान महज 11 दिनों में राज्य में रिकॉर्ड एक लाख शौचालयों का निर्माण कराया गया.

38 फीसदी थे शौचालय
दो अक्तूबर 2014 तक देशभर के ग्रामीण इलाकों में महज 38.70 फीसदी शौचालयों का ही निर्माण हुआ था. करीब 61 फीसदी आबादी खासकर हमारी मां-बहनें खुले में शौच जाने को विवश थीं. स्वच्छ भारत अभियान (ग्रामीण) के तहत महज साढ़े चार वर्षों में वर्तमान में 99.10 फीसदी शौचालयों का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है. शेष कार्य तेजी से कराये जा रहे हैं. दो अक्तूबर 2019 को महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर देश को खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) बनाकर उनके स्वच्छ भारत के सपनों को साकार कर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करने का लक्ष्य रखा गया है.

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देश में बने शौचालयों के आंकड़े
9,26, 50, 865
घरों में शौचालयों का निर्माण (दो अक्तूबर 2014 से अब तक)
5, 58, 608
ओडीएफ गांव
4,96, 423
ओडीएफ गांवों का हो चुका सत्यापन
4, 465
ओडीएफ गांव (नमामि गंगे)
20,86,167
घरों में शौचालय बने (नमामि गंगे)
2,48,100
ओडीएफ ग्राम पंचायत
617
ओडीएफ जिले
30
ओडीएफ राज्य / संघ शासित प्रदेश
60.39
फीसदी बढ़ोतरी हुई घरों में शौचालय निर्माण में

वित्तीय वर्ष                                  शौचालय निर्माण (फीसदी में)
2014                                                  38.70
2015-16                                             50.40
2016-17                                             64.45
2017-18                                             83.80
2018-19                                             98.12
2019-20(
मई तक)                         99.10