aamukh katha

  • Sep 18 2018 1:05PM

घाटे का सौदा नहीं है मिट्टी की कारीगरी

घाटे का सौदा नहीं है मिट्टी की कारीगरी

पंचायतनामा डेस्क

प्रखंड : मांडर
जिला : रांची

 

गिरिधारी कुम्हार महतो मिट्टी के कारीगर हैं. राजधानी रांची से लगभग 30 किलोमीटर दूर मांडर थाना और कंदरी मोड़ के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग-75 के किनारे गिरिधारी का चाक सुबह से लेकर शाम तक घूमता रहता है. उनके चाक पर बने दीये पिछले पांच दशकों से कई घरों को दीपावली में रोशन कर रहे हैं. उनके हाथों से गढ़े घोड़े, हाथी जैसे खिलौने से कई बच्चों के चेहरे पर मुस्कान बिखरती है. उनके हाथ से तराशी गयी लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां पूजी जाती हैं. उनके बनाये घड़ों के ठंडे पानी से कई लोगों ने अपनी प्यास बुझायी. गिरिधारी महतो की दिनचर्या चाक से साथ घूमती है. आज यही उनकी पहचान है. गर्मी में पेड़ों की छांव रहती थी, पर अब सड़क चौड़ीकरण के कारण सब पेड़ कट गये और अब एस्बेस्टस की छत के नीचे काम करते हैं.

कर रहे पुश्तैनी काम
मिट्टी को शक्ल देना गिरिधारी का पुश्तैनी काम है. पिछले कई दशकों से उनके घर में चाक चल रहा है. गिरिधारी भी उसी परंपरा को निभा रहे हैं, पर गिरिधारी को अफसोस है कि उनके बाद उनकी इस परंपरा को कोई आगे नहीं बढ़ा पायेगा, क्योंकि उनके कोई बच्चे नहीं हैं. पढ़ाई के नाम पर गिरिधारी सिर्फ अपना नाम लिखना जानते हैं, लेकिन अपने पिता और दादा से सीखे हुनर की बदौलत आज उनका अपना पक्का मकान है और घर में हर सुविधा उपलब्ध है.

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बाजार की मांग को नहीं कर पाते पूरा
गिरिधारी महतो बताते हैं कि मिट्टी के दीये और अन्य सामान की बाजार में काफी मांग है, लेकिन वो उतना बना नहीं पाते हैं. गिरिधारी अपने बनाये दीये और घड़े को स्थानीय मांडर बाजार और रांची में बेचते हैं. रांची में मिट्टी के दीये की काफी मांग है. कुम्हारों की बदहाली के सवाल पर गिरिधारी कहते हैं कि जो लोग अपने बनाये सामान की मनमानी रकम वसूलते हैं, वो ही ऐसी शिकायत करते हैं. अगर सही दाम से चीजें बेची जायें, तो कुम्हारों को इस काम में भी काफी लाभ है. गिरिधारी अपने इस पेशे से काफी संतुष्ट हैं.

विदेशी सामानों से नहीं पड़ता फर्क
चाइनीज दीये और खिलौनों से कुम्हारों को कितना नुकसान पहुंचा है, इस सवाल के जवाब में आत्मविश्वास से लबरेज गिरिधारी कहते हैं कि उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ा है. आज भी उनके दीये उतने ही बिकते हैं और दीपावली में उतने ही खिलौने बेचते हैं. गर्मियों में घड़ों की मांग हमेशा रहती है. हां, आजकल लोगों के शौक जरूर बदल गये हैं. बच्चे अब मिट्टी के खिलौने से खेलना पसंद नहीं करते हैं. इसके कारण थोड़ा असर जरूर हुआ है. गिरिधारी महतो घड़ा, ग्वालिन, दीया, छोटी मूर्ति और शादी-ब्याह में इस्तेमाल होनेवाली मिट्टी की हर चीज बनाते हैं.

बहुत से कुम्हार दूसरे काम भी करते हैं
गिरिधारी को मिट्टी लाने के लिए चार किलोमीटर दूर नदी में जाना पड़ता है. पानी के लिए गर्मियों में थोड़ी दिक्कत होती है. फिर भी वो अपना काम करते हैं. कहते हैं कि जब से खपरैल मकान बनना बंद हुआ, बाजार में खपड़ा की मांग बंद हो गयी. इसी का नतीजा है कि कई कुम्हार परिवारों ने मिट्टी के काम को छोड़ दिया. आज वो मजदूरी करते हैं या फिर कोई दूसरा व्यवसाय कर रहे हैं. बदलते बाजार के अनुरूप कुम्हार खुद को नहीं तैयार कर पा रहे हैं. अगर सरकारी मदद मिले और प्रशिक्षण दिया जाये, तो यह कला और निखर कर सामने आयेगी.

जो काम अच्छे से कर सकते हैं, वही काम करना चाहिए : गिरिधारी
गिरिधारी कुम्हार महतो कहते हैं कि मिट्टी का कारीगर हूं. इस काम को बेहतर तरीके से कर सकता हूं. इसलिए करता हूं और इससे मुझे संतुष्टि मिलती है. काम करते हुए 50 साल बीत गये, लेकिन कभी भी काम को लेकर शिकायत नहीं हुई, क्योंकि जरूरतें पूरी हो जाती हैं. बचत भी करता हूं. चाक खुद से बनाता हूं और उसे घूमा कर मिट्टी को आकार देकर हमेशा अच्छी आमदनी हो जाती है.