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  • Jan 9 2020 5:23PM

सनातन श्रुति परंपरा और आधुनिक विधाओं से बच्चों को मिल रही है शिक्षा

सनातन श्रुति परंपरा और आधुनिक विधाओं से बच्चों को मिल रही है शिक्षा
आचार्यकुलम में हवन करते बच्चे

समीर रंजन
जिला: रांची 

शुभ संकल्प की स्थिरता जीवन का सबसे बड़ा सत्य है. उस स्थिरता को लाने के लिए जितनी मेहनत, जितना प्रचंड पुरुषार्थ लगता है, शायद ही किसी कार्य में लगता हो. वह युवा जिसमें ऊर्जा सामर्थ्य अंकुरित हो रहा हो, व्यक्ति से समष्टि तक को बदलने की शक्ति हो, अपने स्वरूप को पहचान कर उसे शुद्धतम बनाने और अपने विचारों का सहारा लेकर नयी वैदिक क्रांति का सूत्रपात कर सकता है. धार्मिक व्यक्ति वही है, जिसके जीवन में विकास और आध्यात्मिकता का संतुलन हो. विकास का मतलब शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक व आत्मिक विकास से है. इन सबके विकसित होने पर भौतिक विकास निश्चित रूप से होता है. वैदिक गुरुकुल की सनातन ज्ञान परंपरा एवं वर्तमान समय के आधुनिक विज्ञान, तकनीकी व व्यावसायिक शैक्षणिक पद्धति का दिव्य संगम है आचार्यकुलम. इसका उद्देश्य पूर्ण जागृत व पूर्ण समर्थ आत्माएं तैयार करना है. इसके साथ ही शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व वैज्ञानिक रूप से समर्थ परिवार, समाज, राष्ट्र व विश्व का निर्माण करना है.

पूर्व व पश्चिम शैक्षणिक पद्धतियों का संगम है आचार्यकुलम

राजधानी रांची से करीब सात किलोमीटर दूर रांची-टाटा मुख्य मार्ग पर नामकुम के पास स्थित है पतंजलि योगपीठ ट्रस्ट, हरिद्वार का दिवस आवासीय शिक्षण संस्थान आचार्यकुलम. स्वामी रामदेव एवं आचार्य बालकृष्ण के मार्गदर्शन में आचार्यकुलम में मूल्य आधारित शिक्षा की अभिनव संकल्पना को साकार किया जा रहा है. एक साल पहले शुरू हुए इस विद्यालय में वर्तमान में करीब सात सौ बच्चे-बच्चियां अध्ययनरत हैं. इन विद्यार्थियों में चरित्र निर्माण से लेकर नैतिक शिक्षा व संयुक्त परिवार के साथ-साथ सनातन श्रुति परंपरा एवं आधुनिक विधाओं पर विशेष जोर दिया जा रहा है. परंपरागत वैदिक गुरुकुलीय पद्धति के अनुरूप जहां संस्कृत, वेद, उपनिषद, दर्शन की शिक्षा दी जाती है, वहीं आधुनिक शिक्षा पद्धति के अनुरूप अंग्रेजी, गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, कला, शिल्प व खेलों में भी निपुण बनाया जाता है.

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बच्चों का बौद्धिक विकास

परिवार के सदस्यों से अपेक्षित आचरण की उम्मीद की जाती है. इसका ज्ञान पक्ष है कि बचपन से ही बच्चों का बौद्धिक विकास करना मुख्य लक्ष्य होना चाहिए. अभिभावक भी बच्चों को बौद्धिक विकास के लिए सहयोग करें. अनादि काल से हमारे साथ जुड़े कर्माशय, संस्कार, इस जन्म का स्वभाग व प्रवृत्ति दोष हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती है, लेकिन दृढ़ संकल्प व उत्साह के साथ विवेक पूर्वक योग, साधना व अन्य उपायों से हम इस समस्या का सामना कर सकते हैं. वहीं, आचरण पक्ष है कि स्थूल दोषों से विद्यार्थी सौ प्रतिशत मुक्त रहे तथा सूक्ष्म दोषों को अनुभव करके पूरी ईमानदारी से उनको दूर करने के लिए संकल्पित रहें. एक आदर्श ईश्वर पुत्र, ऋषि-ऋषिकाओं एवं वीर-वीरांगनाओं की संतान तथा धरती माता की श्रेष्ठ संतानों के जैसा आचरण रखना चाहिए.

बच्चों में संस्कार जरूरी

गुरु-शिष्य परंपरा का खत्म होना वर्तमान समय में स्कूली शिक्षा का सबसे कमजोर पक्ष है. अध्यापक का संबंध विद्यार्थियों से केवल कक्षाओं तक ही समिति हो गया है. वर्तमान शिक्षा प्रणाली में बच्चों को भली-भांति न तो माता-पिता से संस्कार मिल पाता है और न ही गुरु से. यहीं से बच्चों में कुसंस्कार पनपता है. यही कुसंस्कार उसके जीवन में विपदाओं का कारण बनता है. इसमें मुख्य भूमिका माता-पिता की है. सभी माता-पिता व अभिभावकों से अपील है कि वे अपनी संस्कृति को जानें व उसी संस्कृति के अनुरूप अपने बच्चों को संस्कार दें. इसके अलावा नशापान से कोसों दूर रहें और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़े.

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योगगुरु स्वामी रामदेव कहते हैं-

बच्चों को मिले युग के प्रवाह को बदलने में समर्थ होने का संस्कार

विश्व के सभी देश भारत में आकर ज्ञान-विज्ञान की दीक्षा लिया करते थे एवं भारत को अपने आध्यात्मिक गुरु व मार्गदर्शक के रूप में स्वीकार करते थे. 18वीं शताब्दी तक भारत शैक्षणिक, आर्थिक, सामाजिक व आध्यात्मिक दृष्टि से विश्व के आदर्श देशों की श्रेणी में रहा है. 18वीं शताब्दी में विश्व बाजार में हमारी 33 फीसदी सहभागिता थी. विश्व की कुल आय में हमारी सहभागिता 27 फीसदी थी. देश में साक्षरता दर 97 फीसदी थी. जर्मन व अंग्रेज विद्धान एवं ब्रिटिश सरकार के दस्तावेजों के अनुसार, प्राथमिक एवं माध्यमिक स्तर के करीब सात लाख 32 हजार गुरुकुल थे, लेकिन अंग्रेजों ने हमारी संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था को नष्ट कर हमारी समृद्धि व गौरवशाली ज्ञान परंपरा को खंडित करने का प्रयास किया.

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हम बच्चों में छिपे महामानव को जागृत कर शिक्षा और संस्कारों से उनके व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास कर उन्हें दुनिया की सफलता, श्रेष्ठ, पूर्ण जागृत और पूर्ण समर्थ इंसान बनाना चाहते हैं. हम पतंजलि विश्वविद्यालय एवं आचार्यकुलम के माध्यम से उन्नत शिक्षा के साथ-साथ वेद-वेदांग, भारतीय संस्कृति, संस्कार, इतिहास, योग, ध्यान, संयम व सदाचार को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाना चाहते हैं. बच्चों में संस्कारों का ऐसा आधार होना चाहिए, जिससे वे पश्चिमी दुनिया के भौतिक वासनात्मक प्रभाव से प्रभावित न हों, बल्कि युग के प्रवाह को बदलने में समर्थ हो सकें.

आचार्य बालकृष्ण कहते हैं-

भारतीयता, आध्यात्मिकता व स्वाभिमान युक्त नेतृत्व तैयार करना आज की जरूरत

हमारे बच्चे देश के भविष्य हैं. माता-पिता की आशाओं व सपनों के केंद्र बिंदु होते हैं. हर माता-पिता अपने बच्चों को दुनिया में सबसे ऊंचाई पर देखना चाहते हैं. अपने बच्चों को श्रेष्ठ शिक्षा के साथ-साथ श्रेष्ठतम संस्कार भी देना चाहते हैं. भारत की सनातन शिक्षा परंपरा में सनातन एवं संस्कारों का श्रेष्ठतम दिव्य समन्वय था. पहले भारत का नेतृत्व गुरुकुलों में तैयार होता था, जहां पर विद्यार्थी वेद-वेदांगों के साथ-साथ शस्त्रविद्या, नीतिशास्त्र व अर्थशास्त्र का भी अध्ययन कर सही- गलत की विवेचना करने की क्षमता प्राप्त कर लेते थे. तब व्यक्ति, परिवार, समाज व राष्ट्र में सत्य-संयमी, सदाचारी व्यक्तियों का सर्वोपरि स्थान होता था, लेकिन वर्तमान शिक्षा पद्धति से बच्चे वेद-वेदांत से दूर होते जा रहे हैं. आध्यात्मिकता, भारतीयता व स्वाभिमान का भाव एवं संस्कार मृतप्राय हो गये हैं. आज जरूरत है सभी क्षेत्रों में भारतीयता, आध्यात्मिकता व स्वाभिमान युक्त नेतृत्व तैयार करना, जिसमें आधुनिकता व भारतीयता का समग्र समावेश हो.

स्थापित मान्यताएं व शाश्वत सत्य को जानें

मान्यता एवं सत्य मे एक बहुत ही गंभीर एवं मौलिक भेद होता है. मान्यताओं के पीछे का सत्य होता है भीड़ एवं तात्कालिक सत्य. क्षणिक सत्य अथवा सतही सत्य ऊपरी सत्य है. शाश्वत सत्य निष्ठा, अखंड या निरंतर रहनेवाले सत्य के मूल में होती है गंभीरता, प्रामाणिकता, स्थायीत्व, गहराई एवं समग्रता. योग में, संयम, सदाचार एवं ब्रह्मचर्य में शाश्वत सत्य सुख है. त्याग, परमार्थ एवं सेवा में सुख है. जीवन केवल भौतिक समृद्धि, सत्ता आदि पाने के लिए ही नहीं है अपितु धर्म, सत्य एवं न्याय के मार्ग पर चलते हुए स्वयं के स्थान पर समष्टि के लिए जीते हुए, जिस सुख-संबंध एवं सफलता या उपलब्धि आदि से हम कभी भी डिगे नहीं, बोर न हों, एक बार भी दुखी न हों. दुख मिश्रित सुख नहीं, बल्कि विशुद्ध सुख, शांति एवं अनंत खुशी मिले वह है. सच्चे सुख का मार्ग है पूर्ण शांति, पूर्णता या मुक्ति का मार्ग. यही है भारत का अध्यात्म श्रेय पथ, ऋषियों का मार्ग, वेद मार्ग, सत्य पथ या वैदिक पथ. जिन आत्माओं को ऐसे सच्चे सुख-शांति, दिव्य सफलता, दिव्य प्रेम या दिव्य संबंध की तलाश या खोज है, वो पूरा जीवन इसी पूर्ण सत्य सोपान में लगाना चाहते हैं, वो वैदिक गुरुकुल में जरूर आयें.