aamukh katha

  • Nov 2 2018 3:23PM

बैजनाथ महतो 32 एकड़ में करते हैं जैविक खेती

बैजनाथ महतो 32 एकड़ में करते हैं जैविक खेती

पंचायतनामा डेस्क

पंचायत: पांचा

प्रखंड: ओरमांझी

जिला: रांची

रांची जिले के ओरमांझी प्रखंड अंतर्गत पांचा पंचायत में रूक्का डैम के किनारे स्थिति है मदातू गांव. गांव में लगभग 80 परिवार रहते हैं, जिसमें से 30-40 परिवार पूरी तरह कृषि पर निर्भर हैं, बाकी 10 परिवार मछली पालन और बांस से जुड़ा काम करते हैं. रूक्का डैम के किनारे होने के कारण गांव में सिंचाई की समस्या नहीं के बराबर है. मदातू के किसान बैजनाथ महतो का नाम राज्य के बड़े किसानों में शामिल है. जैविक खेती के जरिये बेहतर उत्पादन पाने का इन्होंने सफल प्रयोग किया और आज खुशहाल जीवन जी रहे हैं.

2007 में लगाया था ड्रिप एरिगेशन
बैजनाथ महतो एक बेहतरीन फुटबॉल खिलाड़ी भी हैं, लेकिन खेत में समय पर सिंचाई करने के कारण इन्हें फुटबॉल खेलने का मौका नहीं मिल पाता था. वह काफी दिनों से सिंचाई संबंधी समस्या के निराकरण के लिए लगे हुए थे. इसी बीच उन्हें ड्रिप एरिगेशन की जानकारी मिली. जानकारी प्राप्त करने के लिए वे रायपुर गये. यहां से जानकारी हासिल करने के बाद साल 2007 में पर्सनल लोन लेकर अपने खेतों में ड्रिप लगाया. शुरुआत में सफलता हासिल नहीं हुई, पर निराश नहीं हुए. निरंतर लगे रहने का परिणाम मिला और अब उत्पादन बेहतर होने लगा. आज 22 एकड़ खेत में ड्रिप एरिगेशन के जरिये सिंचाई कर रहे हैं. बैजनाथ बताते हैं कि राज्य के पूंजीपति किसानों को छोड़ दिया जाये, तो शायद झारखंड के वो पहले किसान हैं, जिन्होंने अपने खेत में ड्रिप एरिगेशन से सिंचाई शुरू की थी.

2009 से शुरू की जैविक खेती
बैजनाथ महतो जागरूक किसान हैं. रासायनिक खाद का स्वास्थ्य और जमीन पर हो रहे दुष्प्रभाव को अच्छी तरह जानते हैं. इसलिए वह शुरुआती दौर में भी गोबर खाद का ही अधिक से अधिक इस्तेमाल करते थे. धीरे-धीरे उन्हें जैविक खेती की जानकारी मिली और साल 2009 से वह पूरी तरह जैविक खेती करने लगे. अब पूरे 22 एकड़ खेत में रसायनमुक्त सब्जी और 10 एकड़ में धान की जैविक खेती करते हैं.

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किसानों की मानसिकता को बदलना होगा
जैविक खेती को लेकर किसानों की मानसिकता में बदलाव लाना होगा. किसान यह समझते हैं कि बिना रासायनिक खाद इस्तेमाल किये बेहतर उत्पादन नहीं हो सकता है, जबकि सच्चाई यह है कि जैविक खाद और गोबर से भी उतना ही उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है. इससे फायदा यह होता है कि जमीन की उर्वरा शक्ति बनी रहती है. जैविक खाद का इस्तेमाल करने से मिट्टी का रंग बदल जाता है. पौधों में अधिक बीमारी नहीं होती है. जैविक खेती का कोई साइड इफेक्ट नहीं है. सिर्फ फायदा ही फायदा है.

किसानों को देते हैं ट्रेनिंग
बैजनाथ महतो के खेत में विभिन्न विभागों के अधिकारियों के अलावा राज्य भर से किसान आते रहते हैं, जो इनकी तकनीक को देख कर सीखते हैं. राज्य के कई जिलों के विधायक यहां आ चुके हैं. कई किसान यहां से प्रभावित होकर जाते हैं और खुद से जैविक खेती की शुरुआत करते हैं. इसके अलावा बैजनाथ महतो ओड़िशा, पटना और दूसरे जगहों पर जाकर भी किसानों को ट्रेनिंग देते हैं.

तरबूज की खेती का सफल प्रयोग
तरबूज की खेती अमूमन गर्मी के मौसम में होती है, लेकिन अक्तूबर- नवंबर के महीने में बैजनाथ महतो के खेत में तरबूज की फसल लहलहा रही है. जैविक विधि से यह खेती की गयी है. इसके अलावा खेत में करैला तैयार है. मटर की रोपाई चल रही है. बैजनाथ बताते हैं कि अगर किसान अच्छी तरह खेती करें, तो उन्हें कभी भी पैसों की दिक्कत नहीं होगी.

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व्यापारी खुद आकर ले जाते हैं सब्जी
बैजनाथ महतो को सब्जी बेचने के लिए गांव से बाहर नहीं जाना पड़ता है. धनबाद, बोकारो, फूसरो, गोमिया, रांची, रामगढ़ और जमशेदपुर के बाजारों में उनकी सब्जियों की खूब मांग है. स्थानीय व्यापारी भी उनके यहां आकर सब्जी ले जाते हैं.

जैविक खेती करें, सफलता जरूर मिलेगी : बैजनाथ महतो
जैविक खेती भविष्य का एक बेहतर विकल्प है. शुरुआती साल में उत्पादन थोड़ा कम होगा, लेकिन इससे घबराएं नहीं. जब मिट्टी खुद को जैविक खेती के अनुरूप तैयार कर लेगी, तो उसका उत्पादन बंपर होना तय है. इसके साथ ही कीट और बीमारियों से भी छुटकारा मिल जायेगा. बैजानाथ कहते हैं कि अच्छा लगता है जब कोई किसान मुझसे सीख कर जाता है और बेहतर उत्पादन करता है.