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  • May 20 2019 3:56PM

स्वच्छता की वाहक बनीं सखी मंडल की महिलाएं

स्वच्छता की वाहक बनीं सखी मंडल की महिलाएं

कुमार अंकित 

बेहतर साफ- सफाई से ही भारत के गांवों को आदर्श बनाया जा सकता है. महात्मा गांधी के इन शब्दों से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हमारे जीवन में स्वच्छता कितनी जरूरी है. महात्मा गांधी ने देश में न सिर्फ राजनीतिक आजादी, बल्कि गंदगी से भी आजादी यानी स्वच्छ भारत का सपना भी देखा था. इसी सपने को पूरा करने के लिए आजादी के बाद कई कार्यक्रम और योजनाओं को शुरू किया गया, लेकिन दुर्भाग्यवश देश में स्वच्छता में सुधार सिफर ही रहा. मिसाल के तौर पर साल 2014 तक देश के ग्रामीण इलाकों में मात्र 34.7 फीसदी घरों में शौचालय था. शौचालय की उपलब्धता नहीं होने के कारण एक तरफ जहां ग्रामीण समुदाय को कई तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ता था, वहीं दूसरी तरफ खासकर महिलाओं को कई तरह की सामाजिक समस्याओं का सामना करना पड़ता था

स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत
वर्ष 2014 में महात्मा गांधी के स्वच्छ भारत के सपने को साकार करने के लिए केंद्र सरकार ने अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की थी. उन्होंने स्वच्छता के कार्यक्रम को मिशन मोड में शुरू करने का निर्णय लिया और स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत हुई. जनभागीदारी से यह अभियान सफल रहा. गांधीजी का भी मानना था कि जब तक खुद हाथ में झाड़ू और बाल्टी नहीं पकड़ेंगे, तब तक अपने गली, मुहल्ले, गांव या शहर को साफ नहीं कर सकते. स्वच्छ भारत अभियान (ग्रामीण) के तहत देश के हर गांव को 02 अक्तूबर 2019 (जो कि गांधीजी की 150वीं जयंती है) तक खुले में शौच से मुक्त बनाने का संकल्प लिया गया है. यदि हम झारखंड के संदर्भ में बात करें, तो झारखंड ने यह लक्ष्य समय से लगभग एक वर्ष पहले ही हासिल कर लिया है. वर्ष 2018 के झारखंड स्थापना दिवस के मौके पर राज्य को ओडीएफ घोषित किया गया.

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स्वच्छता दूत बनीं दीदियां
राज्य के ओडीएफ की यात्रा में सखी मंडल की दीदियां स्वच्छता दूत बनीं. शौचालय निर्माण की धीमी गति को देखते हुए साल 2016 में झारखंड सरकार ने एक अभिनव पहल की. स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के अंतर्गत शौचालय निर्माण का कार्य सखी मंडल एवं महिला ग्राम संगठनों को सौंपा गया. इस कार्य के लिए दीनदयाल अंत्योदय योजना- राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की ओर से महिलाओं को विशेष प्रशिक्षण दिया गया. राज्यभर की हजारों सखी मंडल की दीदियों ने करीब 3.8 लाख शौचालय का निर्माण किया. राज्य में सखी मंडल ने स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय निर्माण से लेकर व्यवहार परिवर्तन तक के लिए जी-तोड़ मेहनत की है. आज उसी का नतीजा है कि गांव-गांव में शौचालय का उपयोग सुनिश्चित हो पा रहा है. सखी मंडल एवं ग्राम संगठन की महिलाएं अपनी बैठक में शौचालय के उपयोग पर चर्चा करते हुए स्वच्छता की शपथ भी लेती हैं.

सखी मंडल की 55 हजार दीदियां बनीं रानी मिस्त्री
सखी मंडल की महिलाओं के लिए शौचालय निर्माण करना एक चुनौती था, जिसे इन महिलाओं के हौसले, जज्बे एवं संगठन की ताकत ने आसान बना दिया. खास बात यह रही कि ग्रामीण महिलाओं ने इसे एक बेहतर अवसर के रूप में लिया. राज्य की तकरीबन 55 हजार महिलाओं ने शौचालय निर्माण के लिए मेसन का कौशल प्रशिक्षण लिया और आज रानी मिस्त्री के रूप में काम कर रही हैं. सखी मंडल के इस कार्य से जुड़ने के बाद शौचालय निर्माण में काफी पारदर्शिता आयी. उच्च गुणवत्ता वाले शौचालयों का निर्माण हुआ और इसके साथ ही निर्माण कार्य की गति को तेज रफ्तार मिली. यदि रांची जिले के ग्राम संगठन की महिलाओं की बात करें, तो इन्होंने जिले के कई प्रखंडों में पंचमार्ट दुकान स्थापित कर निर्माण कार्य में इस्तेमाल होनेवाली वस्तुएं जैसे- छड़, बालू, ईंट आदि का व्यापार भी शुरू किया. इससे न केवल जिले में शौचालय निर्माण के कार्य में तेजी आयी, बल्कि महिलाओं को वैकल्पिक आय का साधन भी मिला.

ग्रामीण महिलाओं पर दिखा असर
राज्य सरकार की इस अनूठी पहल का सबसे अधिक प्रभाव ग्रामीण महिलाओं पर पड़ा. एक ओर जहां महिलाओं के कार्यक्षेत्र का दायरा बढ़ा, वहीं दूसरी ओर समाज की रूढ़ीवादी सोच को भी चुनौती मिली. शौचालय निर्माण का कार्य जब महिलाओं ने शुरू किया, तब उन्हें समाज में पुरुषों का काफी विरोध झेलना पड़ा था, लेकिन सखी मंडल की बहनें एवं रानी मिस्त्रियों के अडिग और निरंतर प्रयासों ने न केवल गांवों में स्वच्छता के महत्व को बल्कि महिलाओं के सामाजिक दायरे को भी बढ़ाया. महिलाओं की भागीदारी से उन परेशानियों का भी समाधान हुआ, जिन्हें महिलाएं पहले केवल अपने तक रखती थीं.

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केस स्टडी- 01
गुणवत्ता का रखा जाता है ख्याल : बबीता देवी
गिरिडीह के केंदुआगढ़ा आजीविका ग्राम संगठन की बबीता देवी बताती हैं कि ग्राम संगठन के जरिये सैकड़ों शौचालय का निर्माण किया गया. सखी मंडल की बहनों ने सिर्फ शौचालय निर्माण का काम नहीं किया, बल्कि सबसे पहले बिना शौचालय वाले परिवार को चिह्नित किया. फिर हम बहनों ने मिलकर गुणवत्ता का खास ध्यान रखते हुए शौचालय निर्माण किया और उसके बाद जागरूकता के लिए अभियान चलाया. गांव में बने सभी शौचालय का आज उपयोग हो रहा है.

केस स्टडी- 02
महिलाओं के जीवन स्तर में आया सुधार : रीता देवी
कदमाटोल गांव की रीता देवी बताती हैं कि पहले खुले में शौच के कारण महिलाओं को नारकीय जीवन जीना पड़ता था. सामाजिक समस्याओं के अलावा बारिश एवं देर रात शौच के लिए अपनी सुरक्षा को भी ताक पर रखना पड़ता था. शौचालय निर्माण से महिलाओं के जीवन स्तर में काफी सुधार हो रहा है.

केस स्टडी- 03
शौचालय जरूर बनाएं : पूनम देवी
खूंटी जिला के मुरहू प्रखंड स्थित पांडू गांव की पूनम देवी कहती हैं कि पहले घर में शौचालय नहीं होने के कारण अंधेरे का इंतजार करना पड़ता था. इससे अनेक तरह की समस्याएं व बीमारियों को झेलना पड़ता था, लेकिन जब हमने स्वच्छता के बारे में समझा, तो हमने फैसला किया कि पक्का घर बनाने से पहले शौचालय बनाया जाये और हमने यही किया.

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केस स्टडी- 04
राज्य सरकार को धन्यवाद : सुखमनी देवी
रांची जिला अंतर्गत अनगड़ा प्रखंड के कोनाडीह ग्राम संगठन की सुखमनी देवी नवनिर्मित शौचालय को दिखाते हुए बताती हैं कि पहले हमें भी डर लगता था कि हम ये कार्य कर पायेंगे या नहीं, लेकिन आज हम पुरुषों के एकाधिकार वाले इस क्षेत्र में भी आसानी से कार्य कर रहे हैं. झारखंड सरकार को धन्यवाद. महिलाएं एक ओर इस पहल से कुशल बनी हैं, वहीं संगठन को आमदनी भी हो रही है.

प्रगतिशील तरीके से संभव हुआ कार्य
यह माना जा सकता है कि ग्रामीण महिलाओं के अथक प्रयास और समर्थन के बिना राज्य में शौचालय निर्माण का कार्य इतने प्रगतिशील तरीके से संभव नहीं होता. इसके साथ ही राज्य को निरंतर खुले में शौच मुक्त रखने के लिए सखी मंडल लोगों को जागरूक करने का भी काम कर रही है. गांवों में हर महीने स्वास्थ्य और पोषण दिवस मनाते हुए सखी मंडल की महिलाएं लोगों को स्वच्छ रहने और शौचालय इस्तेमाल करने के फायदे गिनाती हैं. साथ में यह भी सुनिश्चित करती है कि लोग सुचारू ढंग से शौचालय का इस्तेमाल करें.

रानी मिस्त्री को मिला सम्मान
झारखंड में सखी मंडल के जरिये शौचालय निर्माण की पहल की सफलता का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि राष्ट्रपति ने लातेहार के उदयपुरा गांव की रानी मिस्त्री सुनीता देवी को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर 2019 के नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया. यह पुरस्कार सुनीता को सखी मंडल से जुड़ कर शौचालय निर्माण में सराहनीय भूमिका निभाने के लिए दिया गया. वहीं इंडियन सैंटिनेशन कोलेशन एवं फिक्की के द्वारा रानी मिस्त्री पहल के लिए झारखंड सरकार को सैनिटेशन अवार्ड से सम्मानित भी किया गया.

स्वच्छता मिशन में ग्राम संगठन की सहभागिता ने गरीब ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार के नये अवसर भी पैदा किये हैं. ग्राम संगठनों की निगरानी में बनते शौचालयों में मजदूरी ही नहीं, राजमिस्त्री का काम भी सखी मंडल की महिलाएं ही करती हैं. स्वच्छता और शौचालयों के साथ रोजगार और सशक्तीकरण- स्वच्छ भारत मिशन में ग्राम संगठनों की सहभागिता एक साथ कई मंजिलें छू रही हैं. यही वो मंत्र है, जिसने झारखंड को एक साल पहले खुले में शौच से मुक्त बना दिया. इन महिलाओं का जुनून अभी थमा नहीं है. शौचालय उपयोग के लिए जागरूकता अभियान जारी है. दशकों से चली आ रही आदत को दूर करने के लिए व्यवहार परिवर्तन पर लगातार कार्य किया जा रहा है. स्वच्छता की असल वाहक आज झारखंड की ये सखी मंडल की दीदियां हैं, जो पूरे देश के लिए उदाहरण बन चुकी हैं.
(
लेखक टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, तुलजापुर के एमए- सामाजिक कार्य के छात्र हैं)