aadhi aabadi

  • Dec 1 2017 1:48PM

गांवों के विकास को लेकर अब दीदियों से भी होती है रायशुमारी

गांवों के विकास को लेकर अब दीदियों से भी होती है रायशुमारी
पंचायतनामा डेस्क
रांची जिला मुख्यालय से 18 किलोमीटर दूर चंदवे पंचायत के दुलिया गांव में सखी मंडल की दीदियों की एकजुटता और सामाजिक भागीदारी का जमीन असर दिखने लगा है. गांव में नयी सड़कें बन रही हैं. रोजी-रोजगार के नये साधन विकसित हो रहे हैं. मूलभूत सुविधाओं में वृद्धि हो रही है. सामाजिक बुराइयां धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं. गांव के घरों में खुशहाली वापस लौटने लगी है.

गांव के लोग जागरूक हो रहे हैं. सभी आगे बढ़ने और गांव के विकास के साथ-साथ खुद का विकास करने को लेकर प्रयासरत हैं. स्वच्छता पर खासा जोर दिया जा रहा है और शौचालयों का निर्माण कार्य तेजी से हो रहा है. सभी ग्रामीणों को शौचालय का उपयोग करने के लिए जागरूक किया जा रहा है. गांव में अब स्कूल के समय में बच्चे खेलते हुए दिखाई नहीं देते हैं. अब सभी बच्चे स्कूल जाते हैं. 

खेतों में भी अच्छी फसल हो रही है. गांव की महिलाओं को अब उनके पति या पिता के नाम पर नहीं पहचाना जा रहा है, बल्कि अब उनकी खुद की अलग पहचान बन रही है. लोग उन्हें अब उनके काम से जानते हैं. कुल मिला कर कहा जाये, तो गांव में सकारात्मक बदलाव आ रहा है. इन सभी बदलाव के पीछे जेएसएलपीएस से जुड़ी सखी मंडल की दीदियों की भूमिका है. सखी मंडल की दीदियों की इच्छाशक्ति और अथक मेहनत से गांव में बदलाव दिख रहा है.
 
पहले ऐसे थे हालात
महिला समूह की दीदी सीमा कुजूर कहती हैं कि आज जो तस्वीर गांव की है, वैसी हालत पहले नहीं थी. पहले गांव की व्यवस्था काफी लचर थी. गांव में सड़क नहीं थी. पीने के पानी के लिए कोई साधन नहीं थे. ग्रामीणों के पास कोई काम नहीं था. पैसे के अभाव में महिलाओं को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था. हालांकि वर्ष 2004 से ही गांव में महिला समूहों का संचालन हो रहा था. दीदियां जागरूक नहीं थीं. समूह के नियमों की सही से उन्हें जानकारी नहीं थी. समूह के लेनदेन का रजिस्टर भी मेंटेन नहीं करती थी. उस दौर में महिलाओं को जागरूक और एकजुट करना भी बहुत मुश्किल था. समूह से कोई फायदा नहीं होता देख, कई बार तो समूह भी टूट गया था. कुछ दिनों बाद फिर से समूह को बनाया गया. कई सारे प्रयासों के बाद महिलाओं को एकजुट किया गया. उस समय भी तीन समूह ऐसे थे, जो कभी बंद नहीं हुआ और जैसे-तैसे चलता रहा. समूह में महिलाएं जो बचत करती थीं, उस बचत का कुछ फायदा नहीं दिखा. परिवार की आर्थिक स्थिति खासतौर पर महिलाओं की आर्थिक स्थिति काफी खराब थी. अपनी खुद की कोई पहचान नहीं थी. गांव में शराब बेचना या मजदूरी करना ही महिलाओं के लिए रोजगार का एकमात्र विकल्प था. अगर किसी को शादी-विवाह के लिए पैसों की जरूरत पड़ जाती थी, तो उसे या तो अपनी जमीन बेचनी पड़ती था या गिरवी रखनी पड़ती थी.
 
अब आया बदलाव
गांव में अब बड़े पैमाने पर बदलाव हुआ है और इसका असर भी दिख रहा है. सखी मंडल से जुड़ी दीदियां बताती हैं कि गांव के अखरा के पास सड़क नहीं बन रही थी. ठेकेदार सड़क को दूसरी ओर से ले जा रहा था. जानकारी मिलने पर महिला समूह की दीदियां सड़क पर उतरीं. ठेकेदार समेत अन्य संबंधित अधिकारियों से बात कर वस्तुस्थिति बतायीं. दीदियों का प्रयास रंग लाया और गांव के अखरा तक सड़क बन गयी. अखरा के पास ही एक जलमीनार भी है, जिससे गांव के लोग पानी पीते हैं. दीदियां बताती हैं कि पहले इस जलमीनार को भी दूसरी जगह बनाने की योजना थी. यहां भी समूह की दीदियों के प्रयास के बाद जलमीनार को अखरा के पास बनाया गया, ताकि ग्रामीणों को लाभ मिल सके. ये कुछ उदाहरण यह बताने के लिए काफी हैं कि गांव के कामकाज और बड़े फैसले लेने में महिलाएं कितनी बड़ी भूमिका निभा रही हैं. वर्ष 2016 में जेएसएलपीएस के सहयोग के बाद जब गांव में महिला समूह की दीदियों को समूह के संचालन का प्रशिक्षण दिया गया और बचत के तरीके बताये गये, तब जाकर दीदियों के जीवन में एक नया सवेरा आया. फिलहाल गांव की लगभग 100 महिलाएं समूह लोन लेकर बकरी पालन, मुर्गी पालन, किराना दुकान, होटल आदि का व्यवसाय करते हुए अपने परिवार को चलाने में अपनी अहम भूमिका निभा रही है. बैंक लिंकेज के जरिये पैसे मिले और दीदियों ने अपना कारोबार शुरू किया. आज कई ऐसी महिलाएं गांव में हैं, जो समूह से लोन लेकर अपनी गिरवी रखी जमीनों को वापस पाकर उसमें खेती कर रही हैं और अपने जीवन स्तर में सुधार ला रही हैं.