aadhi aabadi

  • Dec 1 2017 1:22PM

बदलते परिवेश में महिलाओं की स्थिति

बदलते परिवेश में महिलाओं की स्थिति
आज देश की महिलाएं पहले की तुलना में ज्यादा घर की चहारदीवारी से बाहर निकल रही हैं. वह आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों में शामिल हो रही हैं, लेकिन बदलते माहौल में आधुनिक भारतीय नारी के सामने चुनौतियां भी नये-नये रूप में सामने आ रही हैं.  प्रस्तुत आलेख आधुनिक भारत की महिलाओं के सामने आ रही समस्याओं और चुनौतियों का एक विस्तृत अवलोकन है.
 
भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में काफी बदलाव हुआ है. वर्ष 1947 में जहां देश की मात्र 12 प्रतिशत महिलाएं साक्षर थीं, वहीं वर्ष 2011 में यह आंकड़ा बढ़ कर 74 प्रतिशत हो गया. महिलाओं की आर्थिक स्थिति में भी पिछले 70 सालों में काफी सुधार हुआ है. अब आर्थिक रूप से सशक्त महिलाओं की संख्या तेजी से बढ़ी है.

प्राइवेट तथा सरकारी सेक्टर में नौकरी करनेवाली महिलाओं की सख्या में भी लगातार वृद्धि हो रही है. केंद्र सरकार द्वारा महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है. एक सर्वेक्षण के अनुसार देश में 27 प्रतिशत महिलाएं सरकारी एवं निजी संस्थानों में कार्यरत हैं, लेकिन यह भी सत्य है कि दुनिया के अन्य देशों की तुलना में भारत में महिला कामगारों का पुरुष कामगारों की तुलना में प्रतिशत काफी कम है. वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार चीन में 63.10प्रतिशत, संयुक्त राज्य अमेरिका में 56.30प्रतिशत तथा हमारे पड़ोसी देश नेपाल में 71.1 प्रतिशत महिला कामगार हैं. पिछले एक दशक में भारत में महिला कामगारों के प्रतिशत में गिरावट आयी है. इसका मुख्य कारण परिवार आय में हुई वृद्धि है. पुरुष वर्ग अपने परिवार के खेतों तथा विनिर्माण उद्योग में निचले स्तर पर काम करनेवाली महिलाएं स्वयं के रोजगार से अलग रख रही हैं. महिला कामगारों के प्रतिशत के मामले में 147 देशों की सूची में भारत का स्थान 135 वां है.
 
भारत के कारपोरेट सेक्टर में उच्च पदों पर मात्र पांच प्रतिशत महिला अधिकारी कार्यरत हैं. देश में आज भी यह अवधारणा बनी हुई है कि महिलाएं उच्च पदों से जुड़े दबाव को सही तरीके से प्रबंधित नहीं कर पातीं. बावजूद इसके कि अतीत की तरह ही आधुनिक भारत में भारतीय महिलाओं ने निडरता, दृढ़ता और प्रबंधन की उत्कृष्ट क्षमता का बार-बार प्रदर्शन किया है. दरअसल इस अवधारणा के मूल में पुरुषवादी सोच है, जिसके तहत देश की आधी आबादी को प्रतियोगिता से बाहर कर दिया जाता है.

तमाम तरह के प्रतिरोधों के बाद भी जैसे-जैसे महिलाएं तरक्की कर रही हैं, उनकी समस्याओं का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है. पहले चहारदीवारी के अंदर उनके साथ गैर-बराबरी का व्यवहार होता था. उन्हें बड़े पैमाने पर दहेज के लिए, पुत्री जनने के लिए या अन्य वजह से प्रताड़ित किया जाता था, लेकिन जब से वे घरों की चहारदीवारी से बाहर निकलने लगी हैं, उनके साथ सड़कों पर, ट्रेनों और बसों में, ऑफिस के अंदर आदि जगहों पर हमले बढ़ गये हैं. दरअसल अभी भी ये दुनिया पूरी तरह पुरुषों के लिए बनी प्रतीत होती है. इसका एक उदाहरण देशभर के राष्ट्रीय राजमार्ग हैं. टाटा-रांची राजमार्ग, टाटा-चाईबासा राजमार्ग जैसे अनगिनत राजमार्ग हैं, जहां रास्ते में महिला यात्रियों के लिए शौचालयों की कोई अलग से व्यवस्था नहीं है. सड़क मार्गों के किनारे महिलाओं के लिए सरकारी स्तर पर कोई ऐसी व्यवस्था का न होना एक गंभीर मुद्दा है.
 
देश के स्कूलों में बालिकाओं की संख्या में काफी वृद्धि हुई है. यह संतोष की बात है कि झारखंड सरकार ने आदिवासी बहुल पश्चिमी सिंहभूम जिले के अधिकतर स्कूलों में बालिकाओं के लिए अलग से शौचालयों का निमार्ण कराया है. अलग शौचालय की व्यवस्था न होने के कारण बालिकाओं के साथ किसी अप्रिय घटना की आशंका हमेशा बनी रहती थी.

जब भी देश और समाज में धार्मिक कट्टरता बढ़ती है, सबसे पहला हमला नारी की स्वतंत्रता पर ही होता है. देश में लव जिहाद की कोई पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इक्के-दुक्के मामले में भी अगर ऐसा हुआ है, तो यह महिलाओं के लिए बेहद खतरनाक संकेत है. युद्ध चाहे धर्म के नाम पर हो या किसी और नाम पर, इसका सबसे ज्यादा शिकार स्त्रियां और बच्चियां ही होती हैं. मोक्ष प्रदायक पुत्र की चाह में पढ़े-लिखे समाज में भ्रूण हत्या का दौर अब भी जारी है. एक रिपोर्ट के अनुसार, इस अनैतिक और अमानवीय कृत्य के कारण भारत अब तक तीन मिलियन बेटियों को खो चुका है, किन्तु झारखंड के ग्रामीण अंचलों में डायन के नाम पर प्रतिवर्ष होनेवाले 100 से भी अधिक हत्याओं के पीछे सिर्फ धार्मिक अंधविश्वास नहीं है. कई बार जमीन पर कब्जा करने या विधवा (युवती) द्वारा स्वयं को पुरुष के सामने समर्पित न करना भी शामिल है.
 
यह सही है कि तेजी से विकसित हो रहे भारत में महिलाएं भी आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत हो रही हैं, किन्तु भारत में महिला सशक्तीकरण की रफ्तार अभी भी काफी धीमी है तथा यह कुछ चुनिन्दा क्षेत्रों तक ही सिमट कर रह गयी है. इसका कारण यह है कि आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त हो रही भारतीय महिलाएं घर के बाहर सड़कों, बसों और अपने कार्यस्थल जैसी जगहों पर सुरक्षित नहीं हैं. पुरुष की नीयत के अधीन है. अगर औरत घर के बाहर असुरक्षित है, तो जाहिर है कि वह शिक्षा या नौकरी के लिए अकेले घर के बाहर नहीं निकलेगी और उसकी शुरुआत उसके घर की चहारदीवारी के अंदर ही दफन हो जायेगा. यही वजह है कि महिला सशक्तीकरण और लिंग समानता के लिए महिलाओं की सुरक्षा पहली शर्त है. इसे पूरा करना सरकार की संवैधानिक जवाबदेही है और समाज की नैतिक एवं मानवीय जिम्मेदारी. तेजी से बदलते देश के नये सामाजिक और आर्थिक परिवेश में लिंग समानता और महिला सशक्तीकरण का मुद्दा नयी चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिनसे जूझने के लिए नये समाजशास्त्रीय प्रयोगों की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता.
 
डॉ शुक्ला मोहंती
(कुलपति)
कोल्हान विवि