aadhi aabadi

  • Oct 5 2017 1:51PM

बदलते गांव, उभरता झारखंड सखी मंडल से समृद्ध होतीं ग्रामीण महिलाएं

बदलते गांव, उभरता झारखंड सखी मंडल से समृद्ध होतीं ग्रामीण महिलाएं

विश्व बैंक के निदेशक (भारत) जुनैद कमाल अहमद ने शायद ही सोचा होगा कि झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्य में उन्हें ग्रामीण महिला सशक्तीकरण और स्वयं रोजगार के ऐसे जीवंत उदाहरण देखने को मिलेंगे, जो उनका नजरिया ही बदल देगा. आखिर कौन सोच सकता था कि देश के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में गिने जानेवाले इलाके में काम कर रही झारखंड सरकार जल, जंगल और जमीन से जुड़े गरीब और असहाय लोगों को उपलब्ध संसाधनों से ही भरपेट भोजन मिल सके, इसके लिए उसे ही अपना मिशन बना लेगी. यह संभव हुआ है और इसका श्रेय जाता है आजीविका मिशन और झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रोमोशन सोसायटी (जेएसएलपीएस) को. प्रस्तुत है कुमार विकास की रिपोर्ट.

ग्रा मीण इलाकों में गरीबी दूर करने के उद्देश्य से सखी मंडल आज कई सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन भी कर रही है. झारखंड में जहां-जहां इन योजनाओं का क्रियान्वयन हुआ है, वहां गरीब महिलाओं की सामुदायिक संस्था बना कर आजीविका के स्रोतों से उन्हें जोड़ने का काम किया जाता है. सखी मंडल की महिलाओं को लाभप्रद आजीविका की गतिविधियों से जोड़ कर खुद के बूते गरीबी से बाहर निकलने में उनकी मदद की जाती है. आजीविका मिशन को क्रियान्वित कर रहे झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी का समग्र उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाना है. सामुदायिक संस्थाओं का पोषण और उन्हें मजबूत बनाकर ही यह संभव है. इससे न सिर्फ ग्रामीण समुदाय सशक्त और समृद्ध होगा बल्कि गांव-गिरांव की महिलाएं भी आत्मनिर्भर बनेंगी.

एक सखी मंडल में 10 से 15 गरीब ग्रामीण महिलाओं को जोड़ा जाता है. आजीविका मिशन की ओर से उनको चक्रीय निधि दी जाती है एवं माइक्रो क्रेडिट प्लान बनता है, इससे इन्हें आर्थिक सहायता के साथ-साथ बैंक ऋण दिलाने में मदद दिलायी जाती है. सखी मंडल की महिलाएं टैबलेट दीदी, पशु सखी, कृषक मित्र, इंटरनल सीआरपी आदि के रूप में कार्यक्रम को गांवों में पूरी तरह से आगे बढ़ा रही हैं. इनका आत्मविश्वास आसमां की नयी ऊंचाई को छू रहा है. नयी तकनीक से झारखंड के आदिवासी इलाकों में धान की पैदावार भी बढ़ी है. खेती के साथ-साथ आदिवासी मुर्गी, बतख, बकरी और सूकर पालने का काम करते रहे हैं. समूह के जरिये अब इसे रोजगार का रूप दिया जा रहा है. समूह से कर्ज लेकर शुरू किये गये इस व्यवसाय ने इन परिवारों को गरीबी के दलदल से बाहर निकाला. पहले खेती और मजदूरी करके भी इन्हें दो वक्त का खाना नसीब नहीं होता था.

महिलाओं के प्रोत्साहन से आत्मविश्वास बढ़ा है. वह अब परंपरागत धंधों से बाहर निकल कर नये क्षेत्रों में भी हाथ आजमाना चाहती हैं. बढ़ती आबादी, सिमटते शहर और सिमटते संसाधन ग्रामीण संस्कृति पर खतरा बन कर मंडराने लगे थे. गांवों के वजूद को बचाने के लिए जरूरी था कि लोगों को उनके माहौल ही में जीने के साधन मुहैया कराये जायें. आजीविका मिशन और झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रोमोशन सोसाइटी ने इस काम को बखूबी अंजाम दिया है. आदिवासी बहुल झारखंड की महिलाएं भी पूरे दम-खम के साथ सखी मंडल से जुड़ रही हैं. वह समझ रही हैं कि यही वह ताकत है, जो उन्हें उनकी जड़ों से जोड़े रख सकती है. उन्हें उनके हिस्से की रोटी और माटी दे सकती है. उनके लिए बेहतर कल की इकलौती उम्मीद है आजीविका.    

देखिए कुछ जीवंत उदाहरण
नरेंद्र मोदी के डिजिटल इंडिया प्रोग्राम की तर्ज पर झारखंड ने सखी मंडल के लेखा-जोखा को सुदृढ़ करने के लिए ग्रामीण महिलाओं को टैबलेट दीदी के रूप में तैयार किया है. ग्रामीण इलाकों की जो महिलाएं मोबाइल प्रयोग करना नहीं जानती थीं, आज वो टैबलेट पर काम कर रही हैं और न केवल उससे आवश्यक जानकारी प्राप्त कर रही हैं, बल्कि दूसरी महिलाओं का हिसाब-किताब भी रख रही हैं, साथ ही साथ इंटरनेट का उपयोग भी कर रही हैं. झारखंड में आज 700 से अधिक महिलाएं हैं, जो टैबलेट का मतलब दवाई समझती थीं, परन्तु अब स्वयं टैबलेट दीदी के रूप में काम कर रही हैं. इससे जो उनमें आत्मविश्वास पैदा हुआ है, वह उनके चेहरे पर साफ-साफ दिखता है.

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चाईबासा निवासी सीमा की दो बेटियां हैं. पति का देहांत हो जाने के बाद उन्हें दो बेटियों के लालन-पालन में काफी कठिनाई हो रही थी. ऐसे में वह सखी मंडल से जुड़ीं. धीरे-धीरे सीमा अन्य कई महिलाओं को भी आजीविका मिशन से जोड़ीं. सखी मंडल से सीमा के हालात बदल गये. आज उनकी बेटी इंजीनियरिंग कर रही है. इसी प्रकार झारखंड के बेड़ो प्रखंड के पतराटोली गांव की रहनेवाली कनक लता टोप्पो बैंकिंग सखी कॉरेस्पॉन्डेंट बन गयी हैं. आज कनक झारखंड ग्रामीण बैंक की बीसी सखी के रूप में काम कर रही हैं और वित्तीय बैंकिंग सेवाओं को ग्रामीण लोगों तक पहुंचा रही हैं. इनकी इस पहल से पिछले कई महीने से विधवा पेंशन, वृद्धा पेंशन एवं मनरेगा मजदूरी की राशि सुदूर गांवों के आम लोगों को सहजता से मिल पा रही है. कनक की आज अपनी पहचान है और वो अपने गांव में बैंकवाली दीदी के नाम से जानी जाती हैं.
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नामकुम के डोलाम गांव की प्रफुल्लित एकता की भी आज अपनी पहचान है. एक वक्त था जब उनके पति रोजगार तो करते थे, लेकिन पति और तीन बच्चों का पेट मुश्किल से भर पाता था. उस वक्त प्रफुल्लित एकता आजीविका कृषक मित्र (गांव के गरीब परिवारों को खेती की उन्नत तकनीकों से जोड़कर उन्हें प्रशिक्षित किया जाता है) बन गयीं. इसके जरिये उनके जीवन में प्रफुल्लता आ गयी. प्रफुल्लित तो  एक उदाहरण हैं. अनेक ग्रामीण महिलाओं ने स्वरोजगार के क्षेत्र में कदम रखा और गरीबी के दलदल से वो बाहर निकल गयीं. जहां पहले खेती और मजदूरी करके भी उन्हें दो वक्त का खाना नसीब नहीं होता था, आज वो अपनी तरक्की के सपनों को पंख देकर आसमां छू रही हैं. इन महिलाओं के लिए सशक्तीकरण के कई मायने हैं. आज कई ग्रामीण महिलाओं का अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाने का सपना साकार हुआ है.
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बकरी पालन से जाराटोली, गेतलसूद की रूलुआ देवी की माली हालत सुधर गयी. बकरी पालन को रोजगार का ठोस जरिया बनाने में पशु सखियां काफी मददगार साबित हो रही हैं. पशु सखियों को इसके लिए खास प्रशिक्षण दिया जाता है, जिसके बाद वह मामूली फीस लेकर पशुओं का इलाज करती हैं.
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कोट्टे आजीविका महिला ग्राम संगठन की चार महिलाओं ने गरीबी को मात देते हुए रांची के नगड़ी प्रखंड के स्टेट हाइवे पर आजीविका दीदी कैफे नामक ढाबा खोला है, जो पूरे इलाके में मशहूर है. यह ढाबा सखी मंडल से समृद्ध होती महिलाओं के लिए एक उदाहरण है. झारखंड में ऐसे कई ढाबे जगह-जगह खुल रहे हैं. झारखंड सरकार ने इनकी सफलता को देखते हुए राज्य के सभी जिला प्रशासन कार्यालय एवं प्रखंड कार्यालय में आजीविका दीदी कैफे सखी मंडल के माध्यम से खोलने का निर्णय लिया है. अब तक 35 से अधिक आजीविका दीदी कैफे खुल चुके हैं.