aadhi aabadi

  • Jun 21 2017 1:12PM

महिलाओं की जिंदगी में मिठास घोलती इमली

महिलाओं की जिंदगी में मिठास घोलती इमली
खट्टी इमली बुंडू की महिलाओं की जिंदगी में मिठास भर रही है. 15 उत्पादक स्वयं सहायता समूह की 300 महिलाएं इमली प्रॉसेसिंग प्लांट से जुड़ी हैं और रोजाना काम करके अपने परिवार की तरक्की में भागीदार बन रही हैं. कभी घर से बाहर कदम नहीं रखनेवाली महिलाएं आज धड़ल्ले से मशीन चला रही है.

घर्र-घर्र करती मशीनों की आवाज को महिलाओं ने आत्मसात किया और आजीविका बढ़ाने में जुट गयीं. ग्रामीण महिलाएं इन दिनों बीज एवं छिलका रहित शुद्ध इमली की पैकेजिंग कर रही है. खट्टे और लार टपकाते इन इमलियों के सहारे महिलाएं अपनी जिंदगी में मिठास घोल रही है. राजधानी रांची जिले के बुंडू प्रखंड की स्वयं सहायता समूह की महिलाएं इन दिनों इमली के सहारे आजीविका तलाशने में जुट गयी है. झारखंड स्टेट लावलीहुड प्रमोशन सोसाइटी के सहयोग से एसएचजी महिलाएं इमली को पैकेजिंग कर बाजारों में बेचने की योजना पर काम कर रही है. नयी उमंग ग्रामीण सेवा केंद्र की ओर से बुंडू के बाराबुरू गांव में इमली का प्रोसेसिंग प्लांट लगाया गया. झारस्वाद नाम से इमली की पैकेजिंग ग्रामीण महिलाओं से कराया जा रहा है, ताकि गांव की महिलाओं को गांव में ही रोजगार मिल सके.
 
कैसे आया विचार
वनोपज के रूप में सर्वसुलभ इमली को नगदी फसल के रूप में देखा जाता है. बुंडू, तमाड़ जैसे इलाके में इमली के पेड़ बहुतायात में हैं. सिर्फ बुंडू प्रखंड क्षेत्र की बात करें, तो एक हजार से अधिक इमली के पेड़ इस क्षेत्र में हैं. एक पेड़ से हर साल औसतन चार से पांच क्विंटल के करीब इमली का फल लगता है. इन इमली को व्यापारी ग्रामीणों से मात्र 25 से 30 रुपये प्रति किलो के दर पर ही खरीद लिया करते थे. इसी इमली को प्रोसेसिंग कर व्यापारी उसे बाजार में 80 से 100 रुपये प्रति किलो की दर से बेचते थे. यानी ग्रामीणों को कम और व्यापारियों को अधिक मुनाफा मिलता था. इस समस्या का ग्रामीण काफी परेशान थे. ग्रामीणों ने इस परेशान से जेएसएलपीएस के अधिकारियों को भी अवगत कराते हुए इमली प्रोसेसिंग मशीन गांव में ही लगाने की मांग की. ग्रामीणों की मांग पर जेएसलएलपीस ने नयी उमंग ग्रामीण सेवा केंद्र के माध्यम से बाराबुरू गांव में इमली का प्रोसेसिंग प्लांट लगाने पर सहमति जतायी. 
 
रोजगार के साथ इमली का मिलेगा उचित दाम : मेरी लकड़ा
तारा स्वयं सहायता समूह की सदस्य और बुक कीपर मेरी लकड़ा कहती हैं कि इस प्लांट के लगने से पांच गांवों की 16 महिला सदस्यों को रोजगार मिला है. हर बुधवार को मीटिंग होती है. इसमें कितना कच्चा माल आया है. वह कैसा है और हमें किस तरह की जरूरत है, इसकी जानकारी दी जाती है. ताकि सदस्यों को यह जानकारी हो सके कि किस तरह से काम कर रहा है. महिलाओं को अपने गांवों में काम मिलने से वो काफी खुश दिख रही हैं. इस प्लांट से जुड़ीं महिलाएं बचत कर अपने उत्पादक समूह को और बड़ा बनाना चाहती है. इसके लिए यहां काफी संभावनाएं भी हैं. ग्रामीण विकास केंद्र से अन्य उत्पादक समूह की महिलाओं को भी जोड़ा जायेगा. इस बार इमली का उत्पादन कम हुआ है, लेकिन अगली बार से सभी महिलाओं को काम मिलेगा, ऐसी संभावना है. मेरी लकड़ा कहती हैं कि इमली का पहले भी उत्पादन होता था, लेकिन हमलोग दूसरे व्यापारी को औने-पौने दाम पर दे देते थे. अब इस प्लांट के लगने से रोजगार के साथ-साथ उचित दाम भी मिलेगा. 
 
कैसे होता है काम
बाराबुरू गांव में लगे इमली प्रोसेसिंग प्लांट में महिलाएं मशीन से इमली रेसा और दाना दोनों निकाल रही हैं. इसकी प्रॉसेसिंग कर उसे प्लास्टिक के थैलों में पैक कर बाजार तक पहुंचाया जा रहा है. झारखंड स्टेट लाइवलीहुड मिशन सोसाइटी(जेएसएलपीएस) ने मशीन उपलब्ध कराया है और बाजार भी तलाश रहा है. ग्रामीण सेवा केंद्र में सभी महिलाओं को ड्रेस कोड में चार-चार घंटे के लिए काम करना है. इसके लिए 30 किलोग्राम इमली दी जाती है. महिलाएं मशीन से दाना निकालने के पहले रेसा निकालती हैं और फिर स्वचालित मशीन में कूट कर इमली का फूल (बीज रहित इमली) तैयार किया जाता है. इसके बाद वजन कर उसका पैकेट तैयार किया जाता है. अभी 250 से ज्यादा पैकेट तैयार हो रहा है, जिसके लिए राजधानी रांची में बाजार तलाशा जा रहा है. रांची में इसके लिए 80 से 90 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेचे जाने की बातें चल रही है. रांची के अलावा अन्य शहरों में भी इसे बेचे जाने की योजना पर काम हो रहा है.