aadhi aabadi

  • May 20 2019 3:40PM

पुरुष प्रधान पेशे में शौचालय निर्माण के हुनर से अपनी पहचान बना रही हैं रानी मिस्त्री

पुरुष प्रधान पेशे में शौचालय निर्माण के हुनर से अपनी पहचान बना रही हैं रानी मिस्त्री

आजीविका डेस्क

वर्ष 2016 में स्वच्छ भारत अभियान (ग्रामीण) की शुरुआत देश में व्यापक स्तर पर हुई. इसमें ग्रामीण इलाकों में शौचालय निर्माण एवं उपयोग पर काफी जोर दिया गया. अगर हम झारखंड की बात करें, तो इस राज्य में स्वच्छ भारत अभियान के लक्ष्य को प्राप्त करना अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण कार्य था, लेकिन चार साल के अंदर झारखंड ने खुद को खुले में शौच से मुक्त कर लिया है. इस उपलब्धि का श्रेय जाता है झारखंड की ग्रामीण महिलाओं को. झारखंड की सखी मंडल की महिलाओं ने स्वच्छ भारत अभियान के मशाल को घर-घर तक पहुंचा कर इस अभियान को सफल बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है.

घर-घर शौचालय पहुंचाने में रानी मिस्त्री का योगदान
झारखंड की सखी मंडल की महिलाओं ने रानी मिस्त्री के रूप में कार्य कर घर-घर शौचालय पहुंचाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया. यह बात किसी की भी कल्पना से परे होगी कि झारखंड के सुदूर आदिवासी बहुल क्षेत्रों की ग्रामीण महिलाएं, जो पिछड़ेपन से ग्रस्त थीं, वे देश के सामने एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत होकर महिला सशक्तीकरण की मिसाल बन जायेंगी. प्रधानमंत्री ने भी रानी मिस्त्रियों के कार्य की सराहना करते हुए इन्हें ग्रामीण भारत की इंजीनियर के नाम से संबोधित किया. आज राज्य में रानी मिस्त्री स्वच्छ भारत अभियान (ग्रामीण) की दूत बन चुकी हैं. स्वच्छ भारत अभियान (ग्रामीण) के अंतर्गत ग्रामीण महिलाओं ने रानी मिस्त्री बन कर सिर्फ अपने गांवों में स्वच्छता की अलख ही नहीं जगायीं, बल्कि अपनी आजीविका को भी संवारा. इस अभियान के जरिये इन दीदियों ने समाज की इस रूढ़ीवादी सोच कि महिलाएं पुरुष प्रधान कार्यों को करने में असमर्थ होती हैं, उन्होंने इस मिथक को तोड़ कर पूरे राष्ट्र में एक नयी मिसाल कायम की. जिसने भी इन ग्रामीण महिलाओं को दृढ़ता के साथ निर्माण कार्य करते देखा, वो इनके संकल्प और हिम्मत के आगे झुक गये. तकरीबन 55 हजार प्रशिक्षित रानी मिस्त्रियों द्वारा अब तक राज्य में 3.5 लाख शौचालयों का निर्माण किया जा चुका है.

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इश्रंती के जीवन में आयी रोशनी
सिमडेगा जिले के जलडेगा प्रखंड की रहनेवाली इश्रंती लुगुन का जीवन हमेशा से मुश्किलों और अभावों में ही गुजरा था. पति की मजदूरी से दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से ही नसीब हो पाती थी. ऐसे में स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत रानी मिस्त्री की पहल से इश्रंती के जीवन में रोशनी की एक नयी किरण आयी. इश्रंती ने शौचालय निर्माण की ट्रेनिंग लेकर रानी मिस्त्री का कार्य शुरू किया और आज वे न सिर्फ सिमडेगा जिले में अपनी कारीगरी के लिए जानी जाती हैं, बल्कि गुमला एवं दूसरे जिलों में भी स्वच्छता सहयोग अभियान के अंतर्गत अपना योगदान देकर झारखंड को खुले में शौच मुक्त करने में अपनी अहम भूमिका निभायीं. उनका यह सफर इतना आसान नहीं था. इश्रंती को कई बार घर और गांववालों की निंदा, विरोध एवं आलोचना भी झेलनी पड़ी. कई बार उनका मजाक भी उड़ाया गया. दरअसल, रानी मिस्त्रियों की इतनी बड़ी फौज को खड़ा करना अपने आप में बहुत बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य रहा. राज्य में पुरुष राजमिस्त्री की संख्या तो थी, लेकिन शराब और नशे की लत के कारण इनकी उपलब्धता और इनके काम की गुणवत्ता में काफी कमी दिखाई देती थी. इन बातों को ध्यान में रखते हुए सरकार द्वारा सखी मंडल की महिलाओं को रानी मिस्त्री के कार्य में प्रशिक्षित करने का फैसला लिया गया. प्रशिक्षण के अलावा रानी मिस्त्रियों को राज्य सरकार द्वारा मुफ्त में निर्माण उपकरण और प्रत्येक शौचालय के निर्माण के लिए एक निश्चित धनराशि भी दी जाती है, जिसे रानी मिस्त्रियां आपस में बांट लेती हैं. रानी मिस्त्री की पहल से सिर्फ उन महिलाओं के जीवन में ही उजाला नहीं आया, जो रानी मिस्त्री के हुनर से अपनी आजीविका चला रही हैं, बल्कि इस पहल से गांव की उन महिलाओं की भी जिंदगी सुधर रही है, जो वर्षों से शौचालय के अभाव में शारीरिक व मानसिक वेदनाओं से गुजरती थीं. आज उन्हें अंधेरे का इंतजार नहीं करना पड़ता है.

आजीविका में भी मददगार बना शौचालय
रानी मिस्त्री के कार्य ने न सिर्फ इन महिलाओं को अपनी आजीविका बढ़ाने में मदद की है, बल्कि इन ग्रामीण महिलाओं की इनके गांव, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर एक नयी पहचान बनायी है. कल तक जिन महिलाओं का जीवन घर की चहारदीवारी में गरीबी में व्यतीत होता था, आज वही महिलाएं रानी मिस्त्री की पहचान लेकर समाज में इज्जत और सम्मान की हकदार बन रही हैं. जलडेगा प्रखंड के भुंदिपनी गांव की रानी मिस्त्री मोलेन दांग कहती हैं कि पहले वह मजदूरी करके किसी तरह अपना और अपने परिवार का खर्चा चलाती थीं. रानी मिस्त्री के काम से जहां एक तरफ उनके हाथों में हुनर आया है, वहीं दूसरी तरफ इस बात की भी खुशी होती है कि वह अपने समाज व अपने समुदाय के लिए कुछ कर पा रही हैं. जो लोग कल तक उनका मजाक उड़ाते थे, आज वही उनकी तारीफ करते नहीं थकते हैं.

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सखी मंडल और ग्राम संगठन की महिलाएं रानी मिस्त्री बनकर समुदाय की सहभागिता सुनिश्चित कर रही हैं. ये महिलाएं शौचालय निर्माण से सेंटरिंग तक का काम बखूबी कर लेती हैं. शौचालय निर्माण के बाद इन रानी मिस्त्रियों की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती है. ये अपने-अपने सखी मंडल और ग्राम संगठन की बैठक में शौचालय के उपयोग पर चर्चा भी करती हैं, ताकि गांव के लोग भी स्वच्छता और शौचालय के उपयोग के प्रति जागरूक हो सकें. झारखंड में रानी मिस्त्री के रूप में महिलाओं को आगे लाने के प्रयास को एक सामाजिक आंदोलन के रूप में भी देखा जा सकता है. अगर हम इस आंदोलन को महिलाओं का, महिलाओं के द्वारा और महिलाओं के लिए कहें, तो इसमें तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं होगी. शौचालय निर्माण के फंड को संभालने से लेकर, रानी मिस्त्री का चुनाव एवं रानी मिस्त्री के रूप में कार्य कर इन ग्रामीण महिलाओं ने राज्य में स्वच्छता अभियान को जो गति प्रदान की है, आज उसकी चर्चा हर मंच पर हो रही है. आज रानी मिस्त्री महिला सशक्तीकरण के क्षेत्र में एक ऐसा नाम है, जिसने न सिर्फ पुरुषों के एकाधिकार वाले क्षेत्र में उन्हें चुनौती दी, बल्कि अपनी लगन और निश्चय के बल पर अपने कार्य का लोहा भी मनवाया.