aadhi aabadi

  • Nov 8 2019 1:55PM

महिलाओं की बढ़ रही सामाजिक प्रतिष्ठा

महिलाओं की बढ़ रही सामाजिक प्रतिष्ठा

पंचायतनामा टीम

जिला: रांची

रांची जिले के बुढ़मू प्रखंड की महिलाएं अपनी मेहनत, लगन और एकजुटता से आर्थिक व सामाजिक तौर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं. ये ऐसी महिलाएं हैं, जो पहले कभी घर से बाहर कदम नहीं रखती थीं. घर और खेत में ही काम करना इनकी दिनचर्या थी, लेकिन इन महिलाओं ने अपने दम पर बदलाव लाया. अपने घर और समाज में अपनी अलग पहचान बनायी है. गांव- समाज के काम में इन महिलाओं से सलाह ली जाती है. सहयोग की उम्मीद भी की जाती है. यह इसलिए संभव हुआ है, क्योंकि सुमु गांव की सबिता देवी ने अपनी मेहनत की बदौलत गांव की दूसरी महिलाओं को आगे बढ़ाते हुए खुद भी आत्मनिर्भर बनीं. कौशल्या देवी ने महिलाओं को एकजुट किया और पिछले 10 वर्षों से सफलता पूर्वक जनवितरण प्रणाली की दुकान चला रही हैं. इतना ही नहीं, अपने साथ अन्य 10 महिलाओं की जिंदगी में भी बदलाव ला रही हैं. बेड़वारी गांव की सोनिया देवी बीपीएल सूची के तहत दो गाय लीं. अब उनके पास चार गाय है. अब दूध के व्यवसाय में लगी हुई हैं. उन्हें देख कर दूसरी महिलाएं भी अब गौपालन के लिए आगे आना चाह रही हैं.

1. कभी रहने को छत नहीं, अब पक्का मकान की मालकिन हैं सबिता देवी
सारले पंचायत की सुमु रखौत गांव की सबिता देवी आज किसी पहचान की मोहताज नहीं है. आसपास के गांवों में उनकी सफलता की काफी चर्चा है. सबिता ने न सिर्फ खुद को सशक्त किया, बल्कि अपने गांव की अन्य महिलाओं को भी आगे बढ़ने की राह दिखाई. यही कारण है कि आज गांव के हर सार्वजनिक कार्यक्रमों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाती है. महिलाओं की सफलता की कहानी की शुरुआत वर्ष 2004 में तब हुई, जब सबिता देवी की अगुवाई में गांव में हनुमान महिला समूह का गठन हुआ. समूह का संचालन सही तरीके से होने लगा. बचत भी होने लगी. साल 2009 में समूह को आर्थिक मदद मिली. इससे महिलाओं की आर्थिक परेशानी भी समय-समय पर दूर होती रही.

पत्थर तोड़ने का काम करते थे दंपत्ति
सबिता की जिंदगी में एक ऐसा भी वक्त आया, जब वो और उनके पति स्थानीय पत्थर खदान में पत्थर तोड़ने का काम करते थे. जंगल से लकड़ी लाकर बेचते थे. पति अपनी पूरी कमाई नशे में खर्च कर देते थे. पास में जमीन थी, पर खेती-बारी नहीं के बराबर होती थी. सबिता हमेशा आगे बढ़ने को लेकर सोचती थीं. इसी सोच और कड़ी मेहनत ने रंग दिखाना शुरू किया. खेत में धान और सब्जियां उगाने लगीं. पशुपालन होने लगा. समूह के जरिये सरई फूल और केंदु पत्ता की बिक्री करने लगीं. इससे मुनाफा हुआ. समूह की दूसरी महिलाओं को भी इससे लाभ पहुंचा. धीरे-धीरे सबिता ने पैसे जमा करना शुरू किया. आज उनके पास खुद का एक पक्का मकान है. एक स्कूटी है. एक दुकान भी है. दोनों पति-पत्नी आज खुशहाल जीवन जी रहे हैं.

खुद पर था भरोसा : सबिता देवी
सबिता बताती हैं कि यहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने बहुत मेहनत की है. हर रोज रांची जाने के लिए उमेडंडा तक पैदल चली. जब मुखिया का सहयोग मिला, तो लीज पर खेत लेकर खेती शुरू कीं. अच्छी आमदनी होने पर अब बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला रही हैं. गांव- समाज में महिलाओं की प्रतिष्ठा बढ़ी है.

2. जनवितरण की दुकान से बदल रही महिलाओं की जिंदगी
सारले पंचायते के सारले हठुआगढ़ा की कौशल्या देवी वर्ष 2009 से 10 महिलाओं के साथ मिलकर सफलतापूर्वक पीडीएस दुकान चला रही हैं. इससे सभी महिलाओं के जीवन में बदलाव आया है. कौशल्या बताती हैं कि जो भी महिलाएं जनवितरण प्रणाली की दुकान चला रही हैं, वो पहले बेरोजगार थीं. कृषि और मजदूरी करने के अलावा रोजगार का दूसरा साधन नहीं था. सिंचाई की व्यवस्था नहीं होने के कारण खेती-बारी भी अच्छी नहीं हो पाती थी. रोजगार के लिए पलायन करना पड़ता था. इसके बाद वर्ष 2006 में कौशल्या देवी के नेतृत्व में मां लक्ष्मी स्वयं सहायता समूह का गठन हुआ. समूह के जरिये बचत होने लगी. फिर महिलाओं ने पीडीएस की दुकान ली. आज वो अच्छे से अपना जीवन व्यतीत कर रही हैं.

पीडीएस दुकान ने बदली हमारी जिंदगी : कौशल्या देवी
कौशल्या देवी बताती हैं कि पीडीएस दुकान मिल जाने से समाज में उन महिलाओं की प्रतिष्ठा बढ़ी है. घर में भी सम्मान मिलता है. पैसों की जरूरत खुद से पूरा कर लेते हैं और परिवार में भी सहयोग करते हैं. बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला रही हैं. कौशल्या खुद पांचवीं पास हैं, लेकिन उनके दो बच्चे बीए पार्ट वन और इंटर में पढ़ रहे हैं.

3. दूध व्यवसाय से दूसरी महिलाओं को रास्ता दिखा रहीं सोनिया
हेसलपीरी पंचायत अंतर्गत बेड़वारी गांव दूध उत्पादन के लिए जाना जाता है. गांव से हर रोज बड़ी मात्रा में दूध रांची भेजा जाता है. यहां खेती भी ढंग से की जाती है. इसी गांव की सोनिया देवी पहले दूसरों को देख कर दूध उत्पादन करने को प्रोत्साहित हुईं. बीपीएल गाय योजना के तहत गाय लेकर आज अपनी आय बढ़ा रही हैं. बीपीएल परिवार के लिए गाय योजना के तहत वर्ष 2016 में उन्हें शेड बनाने के लिए पैसे मिले और एक गाय खरीदने के लिए 45,000 रुपये की राशि मिली. कुछ दिनों के बाद बीमारी के कारण गाय की मौत हो गयी, लेकिन सोनिया ने हिम्मत नहीं हारी. योजना के तहत एक गाय और मिली. गाय के बीमा के पैसे से उन्होंने एक और गाय खरीदी. इससे हर रोज लगभग 20 लीटर दूध का उत्पादन होने लगा. आज सोनिया के पास चार गाय हैं और एक बछिया है. दो गाय उन्होंने खुद की बचत के पैसे से खरीदा है.

खुद से करती हैं देख-रेख
सोनिया बताती हैं कि सभी गाय की देखरेख वो खुद करती हैं. गाय के रहने के लिए एक बड़ा शेड भी बनाया है. साफ-सफाई पर पूरा ध्यान देती हैं. पति का भी सहयोग मिलता है. अपने खेत में ही गाय के लिए हरा चारा भी उगाती हैं. खाना खिलाने और पानी पिलाने का पूरा जिम्मा सोनिया खुद ही संभालती हैं. सोनिया बताती हैं कि गांव में हरा चारा है. गाय को हरा चारा खिलाती हैं. इसलिए दुग्ध व्यवसाय में बचत होती है. हर महीने 18-19 हजार रुपये की आमदनी हो जाती है.

मेहनत है, लेकिन फायदा भी है : सोनिया देवी
सोनिया देवी बताती हैं कि गौपालन में काफी मेहनत है. दिनभर गाय के पास साफ-सफाई करनी पड़ती है. पति के नहीं होने पर दूध दूहना पड़ता है. इस काम में छुट्टी नहीं मिलती है. पर्व-त्योहार में भी गाय के पीछे लगा रहना पड़ता है, पर यह काम उन्हें अच्छा लगता है. आगे और भी गाय खरीदने की योजना है. सोनिया के इस काम को देख गांव की अन्य महिलाएं भी दुग्ध व्यवसाय शुरू करने को लेकर प्रोत्साहित हो रही हैं.