aadhi aabadi

  • Jan 17 2020 6:26PM

महिला समूह की दीदियों की शानदार पहल, दाल मिल से सशक्त हो रही गांव की अर्थव्यवस्था

महिला समूह की दीदियों की शानदार पहल, दाल मिल से सशक्त हो रही गांव की अर्थव्यवस्था
दाल मिल के बाहर अपने उत्पाद को दिखातीं सखी मंडल की दीदियां

पंचायतनामा टीम
जिला: रामगढ़ 

रामगढ़ जिला अंतर्गत मांडू प्रखंड की पहचान इन दिनों दाल उत्पादक प्रखंड के तौर पर होने लगी है, हालांकि पहले से ही इस क्षेत्र में काफी संख्या में किसान अरहर की खेती किया करते थे. अब दाल मिल खुल जाने के बाद किसानों को अरहर के अच्छे दाम मिलने लगे हैं. सुरूचि नेचुरल्स नाम की यह दाल हजारीबाग और रामगढ़ जिले में धीरे-धीरे अपनी पकड़ बना रही है. इस सफलता का पूरा श्रेय दुर्गा महिला विकास सपोर्ट संघ की महिलाओं को जाता है. 2014 में इस समूह का गठन किया गया था. इसके बाद समूह की महिलाओं ने कुछ अलग करने का निर्णय लिया. जेएसएलपीएस के सहयोग से महिलाओं को दाल मिल की मशीन दी गयी. मांडू महिला एग्रीकल्चर फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड से समूह को जोड़ा गया. इसके बाद दाल उत्पादन का सिलसिला शुरू हुआ. दाल उत्पादन से समूह की महिलाओं को जहां अच्छी आमदनी हो रही है, वहीं उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव भी आ रहा है.

किसानों की मददगार

मांडू प्रखंड के किसानों को एक साथ जोड़ने और उन्हें बेहतर बाजार उपलब्ध कराने के साथ-साथ समय- समय पर आर्थिक मदद देने के लिए मांडू महिला एग्रीकल्चर फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड का गठन हुआ. महिला किसान सशक्तीकरण परियोजना (एमकेएसपी) के तहत इसका गठन किया गया. इसके तहत बैकयार्ड पॉल्ट्री और बैकयार्ड फार्मिंग भी करायी जाती है. दाल उत्पादन भी इसी योजना के तहत किया जा रहा है. प्रोड्यूसर कंपनी से 24 ग्राम संगठन के 257 स्वयं सहायता समूह जुड़े हैं. दाल मिल से जो मुनाफा होता है, उसका हिस्सा कंपनी के पास भी रहता है, जो समय-समय पर दाल मिल को दाल खरीदने के लिए लोन भी देती है. इसके अलावा कम ब्याज दर पर दाल उत्पादक किसानों को भी लोन मुहैया कराया जाता है.

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90 मीट्रिक टन दाल उत्पादन का लक्ष्य

मांडू प्रखंड में महिला किसान सशक्तीकरण परियोजना के तहत 23 गांवों के 1500 किसानों को जोड़ने का लक्ष्य है. फिलहाल 1153 किसान इससे जुड़ चुके हैं. किसानों को इसके लिए प्रशिक्षण भी दिया गया है. जानकार बताते हैं कि मांडू प्रखंड की आबोहवा भी अरहर दाल के उत्पादन के लिए उपयुक्त है. जोबला गांव में ही महिला समूह की महिलाओं ने मिलकर 10 एकड़ जमीन में अरहर दाल की खेती की है. करमा गांव में 120 किसानों ने 43 एकड़ जमीन में अरहर दाल की समूहिक खेती की है. सभी दाल देसी ब्रीड के हैं, जो पहले से किसानों के पास थे. दाल का उत्पादन जैविक तरीके से किया जाता है. किसानों को जैविक खाद बनाने का प्रशिक्षण भी दिया गया है. एक ही जगह पर सामूहिक रूप से खेती करने पर किसानों को कम लागत और मेहनत में ज्यादा मुनाफा हो रहा है.

25 से 30 हजार तक बढ़ी किसानों की आय

दाल प्रसंस्करण इकाई खुल जाने के बाद से ही प्रोड्यूसर कंपनी से जुड़े किसानों की आय में सालाना 25-30 हजार रुपये की बढ़ोतरी हुई है. किसान पहले भी अरहर दाल की खेती करते थे, पर उन्हें अच्छा बाजार नहीं मिल पाता था. इसके कारण वो आर्थिक तौर पर कमजोर थे. अब प्रसंस्करण इकाई खुल जाने के बाद दाल बेचने की व्यवस्था हो गयी है. इससे उन्हें फायदा हो रहा है. साथ ही खाने में भी दाल की कमी नहीं हो रही है. आय बढ़ने से उनके जीवन स्तर में सुधार हो रहा है.

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सौर ऊर्जा का होता है इस्तेमाल

वर्ष 2017 में जेएसएलपीएस द्वारा दाल प्रसंस्करण इकाई स्थापित करने के लिए दुर्गा महिला विकास सपोर्ट संघ को दो लाख रुपये की आर्थिक मदद की गयी. किराये के भवन में यह मिल चल रही है. राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत बने शेड में किराये पर यह चलाया जा रहा है. इसके लिए महिला समूह द्वारा प्रतिमाह 500 रुपये किराये के तौर पर दिया जाता है. निर्बाध बिजली आपूर्ति के लिए सोलर प्लेट लगाये गये हैं. इससे 330 वाट विद्युत आपूर्ति होती है. सौर ऊर्जा का इस्तेमाल इसलिए भी फायदेमंद है, क्योंकि दाल की खरीद फरवरी माह से मई तक होती है. प्रसंस्करण भी इसी दौरान होता है. इस समय धूप भी अच्छी रहती है.

दाल उत्पादन के आंकड़ें

वर्ष खरीद की मात्रा (क्विंटल) खरीद दर (प्रति कि ग्र) दाल बिक्री दर (प्रति कि ग्र)

2017-18           17                 45-50                            85

2018-19            35                  55                                90

2019-20             62                  55                             90-95

दाल प्रसंस्करण के बाद 20 फीसदी वजन घट जाता है. प्रसंस्करण करने में प्रति किलो पांच रुपये का खर्च आता है. कुछ किसान दाल मिल तक खुद से अरहर पहुंचा देते हैं. जहां पर अरहर की मात्रा अधिक होती है, वहां समूह की महिलाएं खुद जाकर अरहर खरीद लेती हैं. पैसे किसान के खाते में दो या तीन दिन में आ जाते हैं. वर्ष 2017 में 50 किसानों ने अरहर की बिक्री की थी, वहीं वर्ष 2018 में 170 किसान और वर्ष 2019 में 285 किसानों ने अरहर की बिक्री की.

समूह की महिलाओं की कमाई बढ़ी : मीना देवी

दुर्गा महिला विकास सपोर्ट संघ की कोषाध्यक्ष मीना देवी बताती हैं कि दाल प्रसंस्करण इकाई खुल जाने से उन्हें रोजगार मिल गया है. महीने में चार से पांच हजार रुपये की आमदनी सभी सदस्यों को हो रही है. इससे उनके जीवन में खुशहाली आयी है. बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ रहे हैं. खान-पान और रहन-सहन में काफी सुधार आया है. परिवार में प्रतिष्ठा बढ़ी है.

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सभी महिलाएं अलग-अलग करती हैं काम : दिनेश्वरी देवी

दुर्गा महिला विकास सपोर्ट संघ की सदस्य दिनेश्वरी देवी बताती हैं कि समूह की सभी सदस्यों को मशीन चलाने का प्रशिक्षण दिया गया है. सभी महिलाएं अलग-अलग काम करती हैं. इससे काम आसान हो जाता है. अब हमारी जिंदगी पहले से बेहतर हुई है. पहले हम सिर्फ खेती-बारी करते थे. कमाई का जरिया नहीं था, पर अब जेएसएलपीएस के सहयोग से हमारी आमदनी बढ़ी है.

हमें मिल रही है अलग पहचान : फूलमनी देवी

दुर्गा महिला विकास सपोर्ट संघ की सदस्य फूलमनी देवी बताती हैं कि अब हमारी पहचान बढ़ गयी है. 15 से 20 किलोमीटर के दायरे के दाल उत्पादक किसान यहां आते हैं और अरहर बेचते हैं. उनके बीच हमारी पहचान है. लोगों को जैविक दाल खिला रहे हैं. इस दाल को लोग काफी पसंद कर रहे हैं. पहले हमें बाजार और दुकान में जाकर दाल को बेचना पड़ता था, पर अब मिल से आकर ही लोग ले जाते हैं.