aadhi aabadi

  • Feb 18 2019 5:34PM

सशक्तीकरण है एक सतत प्रक्रिया

सशक्तीकरण है एक सतत प्रक्रिया

रघुवर दास, मुख्यमंत्री झारखंड

महिला सशक्तीकरण सिर्फ बयान या कोरी कल्पना नहीं है, बल्कि यह समाज को ठीक ढंग से चलाने के लिए जरूरी भी है. झारखंड जैसे प्रदेश में आदिवासी समाज में महिलाओं को भरपूर सम्मान और आदर दिये जाने की परंपरा रही है, लेकिन पुरुष प्रधान समाज में समय बीतने के साथ महिलाओं को बराबरी का वह दर्जा नहीं मिल पाया, जिसकी वे हकदार हैं. चार वर्ष पूर्व राज्य में सत्ता संभालने के साथ ही मैंने महिला सशक्तीकरण के लिए संपूर्ण प्रयासों की बात की थी. आज यह देख कर संतोष होता है कि राज्य की महिलाएं धीरे-धीरे महत्वपूर्ण निर्णयों में भागीदारी की भूमिका निभाने लगी हैं. शिक्षा के प्रति परिवारों का रुझान बढ़ा है. कम उम्र में शादी जैसी कुप्रथा के खिलाफ लड़कियां ही आवाज उठाने लगी हैं. अब लड़कियां पढ़ना चाहती हैं. अपने सपने पूरा करना चाहती हैं. उनके सपने पूरे करने में हम भागीदारी निभा रहे हैं.

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स्त्री सृष्टि की शक्ति है. इस शक्ति को और अधिक सशक्त बनाने के उद्देश्य से ही हमने 24 जनवरी, 2019 को राष्ट्रीय बालिका दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री सुकन्या योजना की शुरुआत चाईबासा से की. इस कड़ी में यह एक बड़ा कदम है. यह उन परिवारों को समर्थ बनायेगा, जो यह समझते हैं कि परिवार में लड़की हुई, तो इसकी चिंता कौन करेगा. इसके विवाह के लिए पैसे कहां से आयेंगे. अब इन चिंताओं को हमने ले लिया है. जन्म से लेकर बेटी की शादी तक हम नियमित अंतराल में उसके खाते में धनराशि डाल रहे हैं. इससे गरीब मां-बाप का बोझ जरूर कम होगा. मुख्यमंत्री सुकन्या योजना की जानकारी हर अभिभावक को होनी चाहिए, ताकि राज्य की कोई बच्ची इस योजना से अछूती न रहे. अभिभावक अपनी बच्चियों का निबंधन स्कूल में जरूर करायें. सरकार एक बेटी के जन्म से लेकर शादी तक 70 हजार रुपये देगी.

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हमारा मानना है कि बेटियां कभी बोझ नहीं होतीं. जो ऐसा मानते हैं वे पहले भी गलत थे और आज भी गलत हैं. बेटियों को अवसर देकर देखिये, वे बेटों को पीछे छोड़ने का माद्दा रखती हैं. अगर बेटियों की कम उम्र में शादी के लिए कोई दबाव बनाये, तो इसकी सूचना 181 पर दें. सभी अभिभावकों से अपील है कि कम उम्र में बच्चों की शादी न करें. हमारे बच्चों को पढ़ने दें, खेलने दें और पढ़ाई के बाद जब बड़ी हो जायें, तो शादी की चिंता माता-पिता को करनी चाहिए, क्योंकि पहले पढ़ाई, फिर विदाई.

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राज्य में महिला सशक्तीकरण के लिए कई स्तरों पर हमने व्यापक कदम उठाये हैं. ग्रामीण स्तर पर सखी मंडलों की स्थापना कर महिलाओं को समृद्ध करना, उन्हें रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना, समूह की महिलाओं को ऋण के माध्यम से सशक्त बनाने और इस बहाने पूरे परिवार को अपने पैरों पर खड़ा करने का अभियान तेज गति से चल रहा है. राज्य में जहां 14 साल में मात्र 18 हजार महिला समूह का गठन हुआ था, वहीं महिला सशक्तीकरण की दिशा में वर्तमान सरकार की ओर से एक लाख से अधिक महिला समूह का गठन किया गया.

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जब स्वच्छता अभियान की शुरुआत हुई, तो राज्य की रानी मिस्त्रियों ने सफलता के कीर्तिमान ही गढ़ दिये. ऐसी लगनशील महिलाओं की बदौलत ही राज्य में शौचालय अभियान अपनी संपूर्णता की ओर बढ़ पाया, वहीं वर्तमान वित्तीय वर्ष में राज्य की विधवा बहनों की पेंशन राशि में चार सौ रुपये की बढ़ोतरी की गयी है. अब छह सौ रुपये की जगह एक हजार रुपये विधवा बहनों को मिलेंगे.
स्कूली शिक्षा पर जब हमने ध्यान दिया, तो पाया कि चार वर्ष पूर्व स्कूलों की हालत खस्ता थी. बच्चों को बैठने को पर्याप्त बेंच-डेस्क नहीं थे. अब यह स्थिति बदल गयी है. राज्य के सभी सरकारी स्कूलों में सरकार ने बेंच-डेस्क मुहैया करा दिये हैं. मध्याह्न भोजन की गुणवत्ता काफी हद तक सुधर गयी है और नियमित है. अधिकतर विद्यालयों में बिजली भी पहुंचायी जा चुकी है. दूर-दराज से आनेवाली बच्चियों को सीधे डीबीटी के माध्यम से साइकिलें दी गयी हैं. अब बच्चियां उत्साह से विद्यालय आती हैं. शिक्षा से ही राज्य की गरीबी को खत्म कर सकते हैं.

समाज का सशक्तीकरण एक सतत प्रकिया है. अगर ईमानदारी से प्रयास किये जायें, तो परिणाम मिलते हैं. महिला सशक्तीकरण की दिशा में सरकार प्राथमिकता निर्धारित कर काम कर रही है. वह दिन दूर नहीं, जब हमारी बच्चियां और महिलाएं उन क्षेत्रों में भी अपनी कामयाबी के झंडे गाड़ेंगी, जो पुरुषों के लिए सुरक्षित समझे जाते थे, हालांकि ऑटो और ट्रेन ड्राइवर जैसे काम कर हमारी बेटियों-महिलाओं ने इसकी शुरुआत काफी पहले कर दी है.