aadhi aabadi

  • Apr 3 2018 11:27AM

घरेलू हिंसा मुक्त गांव है खूंटपानी का जोंको शासन

घरेलू हिंसा मुक्त गांव है खूंटपानी का जोंको शासन

आजीविका डेस्क

महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा की खबरें अक्सर सुनने को मिलती हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की 2015 की रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड में हर साल 1,654 घरेलू हिंसा के मामले दर्ज होते हैं. ऐसे में सुकून देता है कि पश्चिमी सिंहभूम जिला अंतर्गत खूंटपानी प्रखंड का जोंको शासन गांव घरेलू हिंसा मुक्त गांव है. इसका पूरा श्रेय दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत बने जोंको शासन आजीविका महिला ग्राम संगठन को जाता है. करीब दो सौ घर वाला जोंको शासन गांव इसी साल घरेलू हिंसा मुक्त गांव घोषित हुआ है.

घरेलू हिंसा की रोकथाम के निर्णय का दिखा असर
गांवों में आये दिन घरेलू हिंसा की घटना से परेशान महिलाओं ने इसकी रोकथाम का निर्णय लिया. महिला ग्राम संगठन की सभी सदस्यों ने पंचायत के साथ बैठक की. इस बैठक में घरेलू हिंसा करने वाले गांव के सभी पुरुषों के खिलाफ कार्रवाई करने के साथ ही जुर्माने के तौर पर पांच हजार रुपये व एक क्विंटल चावल लेने का निर्णय लिया गया. इस निर्णय का असर दिखा. ग्रामीण पुरुष, महिलाओं के साथ हिंसा करने से डरने लगे और धीरे-धीरे घरेलू हिंसा से गांव मुक्त होने लगा.

ग्रामीण महिलाओं का दर्द
1.
घरेलू हिंसा मुक्त गांव बनाने के बारे में सोचना हमारे लिए काफी मुश्किल था, लेकिन वर्ष 2016 में कुछ ऐसा घटित हुआ, जिससे गांव की महिलाओं को नयी सुबह देखने का अवसर मिला.
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शांति जोंको, ग्राम संगठन की अध्यक्ष

2.
कुछ समय पहले सभी सखी मंडल की सदस्य सामाजिक समस्याओं व उसके निवारण पर प्रशिक्षण ले रहे थे. इस दौरान घरेलू हिंसा पर भी चर्चा हुई कि किस प्रकार सखी मंडल अपनी एकता से इसका निवारण कर सकते हैं. इसे एक नाटक के माध्यम से भी दिखाया गया. तब मैंने यह सोचा भी नहीं था कि कुछ समय बाद यह घटना मेरे साथ ही घट जायेगी. प्रशिक्षण लेकर जब मैं घर लौटी, तो मेरे पति ने शराब पीकर मारपीट शुरू कर दी. तब मेरे पास एक मात्र सहारा सखी मंडल ही था, जिसने इस विपरीत परिस्थिति में मेरी रक्षा की.
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मालती, सखी मंडल की सदस्य

जेएसएलपीएस ने हमें बनाया सशक्त : सखी मंडल सदस्य
सखी मंडल की अध्यक्ष शांति जोंको, सचिव बबीता लोहारी, कोषाध्यक्ष सुकरमनी जोंको, बसंती देवी सहित गांव की अन्य महिलाओं का कहना है कि आज वह गांव में घरेलू हिंसा के खिलाफ बोल पाती हैं, तो इसका पूरा श्रेय सखी मंडल को जाता है. उन्हें सशक्त करने में झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी का काफी महत्वपूर्ण योगदान रहा है.

हुनर की बदौलत अपनी आजीविका बढ़ाती सखी मंडल की दीदियां


रानीमिस्त्री पूनम की आज है अपनी पहचान 


सखी मंडल की महिला सदस्य आज रानीमिस्त्री बन कर शौचालय निर्माण में बखूबी सहयोग कर रही हैं. पलामू जिला अंतर्गत लेस्लीगंज प्रखंड के चौखड़ा ग्राम निवासी राजपाल पासवान की पत्नी पूनम देवी सरस्वती आजीविका स्वयं सहायता समूह की सदस्य हैं. पूनम एक राजमिस्त्री हैं, जिन्हें रानीमिस्त्री कह कर पुकारा जाता है. पूनम अपने गांव में 40 शौचालयों का निर्माण कार्य कर चुकी हैं. वह बताती हैं कि उन्होंने कोटखास पंचायत भवन में शौचालय निर्माण की तकनीकी पहलुओं का प्रशिक्षण लिया था. इसके बाद शौचालय निर्माण कार्य में लग गयीं.

पूनम ने काफी संकटों को झेला
यह बदलाव यूं ही नहीं आया. कर्ज में डूबी लाचार पूनम बताती हैं कि आज से करीब चार साल पहले उन्होंने अपनी ननद की शादी में दहेज देने के लिए 10 फीसदी ब्याज दर से साहूकार से 50 हजार रुपया कर्ज लिया था. फिर भी दहेज देने के लिए उतने पैसे पर्याप्त नहीं थे. मजबूरन उन्हें तीन कट्ठा जमीन बेचनी पड़ी. कर्ज में डूबी पूनम के सामने एक साथ कई समस्याएं आ गयीं. गांव में काम नहीं मिलने के कारण घर चलाना भी मुश्किल हो गया था. कर्ज के पैसे चुकाने की चिंता अलग थी. रोजी-रोजगार के लिए दोनों पति-पत्नी अपने एक वर्षीय पुत्र के साथ शहर में काम करने चले गये. वहां पति राजमिस्त्री का काम करने लगे और पूनम रेजा का काम. छोटे बच्चे को लेकर काम करना मुश्किल था. इसी दौरान एक बार छत से गिर गयी, जिससे सर में चोट भी लगी. इसके बावजूद पूनम हार नहीं मानी और रेजा का काम करने लगी. काम करते-करते कुछ दिनों में राजमिस्त्री का काम भी करने लगीं. करीब तीन साल तक शहर में रह कर काम कीं. इसके बाद वापस गांव आयीं. इस दौरान साहूकार से लिये कर्ज को भी चुकता कर दिया.

गांव में मिले रोजी-रोजगार, तो बाहर जाने की जरूरत नहीं : पूनम देवी
अपने गांव चौखड़ा वापस आने पर पूनम देवी को जानकारी मिली कि स्वयं सहायता समूह एवं ग्राम संगठन के सदस्यों को स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय निर्माण में सहयोग करना है. शहर में राजमिस्त्री का काम कर चुकीं पूनम को यह काम अच्छा लगा. पूनम ने शौचालय निर्माण कार्य की तकनीकी पहलुओं की जानकारी लेते हुए प्रशिक्षण प्राप्त किया. इसके बाद शौचालय निर्माण कार्य से जुड़ गयीं. इसके बाद पूनम कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखीं. पैसे की खातिर बेचे गये खेत को पूनम ने वापस खरीद लिया. पूनम कहती हैं कि अगर गांव में रोजी-रोजगार हो, तो कोई भी बाहर नहीं जायेगा. गांव में ही रोजगार मिलने से गांव-समाज का भी विकास होगा. पूनम कहती हैं कि पहले लोग मुझे रामपाल पासवान की पत्नी के नाम से जानते थे, लेकिन आज उनकी अपनी पहचान है. लोग रानीमिस्त्री के नाम से बुलाते हैं.

मसाले पैकिंग से जीवन की राह बनी आसान


गुमला जिले के सिसई गांव में दुर्गा स्वयं सहायता समूह को मसाला पैकिंग के व्यवसाय में काफी सफलता मिली है. राजधानी रांची के बाजारों से थोक भाव में गोटा मसाला खरीद कर सखी मंडल की सदस्य छोटे-छोटे पैकेट में बना कर उसे बेचती हैं. 10 सदस्यों के समूह ने यह साबित कर दिया कि महिलाओं का हुनर बोलता है.

सदस्यों के बीच आपसी सामंजस्य का दिखता असर
मात्र पांच हजार रुपये से मसालों की पैकिंग का व्यवसाय शुरू करनेवाली सखी मंडल की सदस्यों का यह कार्य धीरे-धीरे चल पड़ा. इसके बाद सदस्यों ने समूह से ढाई लाख रुपये का लोन लेकर इस व्यवसाय को बड़ा रूप देना शुरू किया. शुरुआती दौर में बाजार की समझ नहीं होने के कारण लाभ काफी कम था, पर सभी सदस्यों के निरंतर प्रयास ने बाजार, लाभांश, कार्यशैली और प्रबंधन को बेहतर तरीके से समझा. सखी मंडल की सदस्य मसाले की पैकेट को खुदरा व थोक में बेचती हैं. सखी मंडल की सदस्यों के बीच बेहतर सामंजस्य है और यही कारण है कि काम के उचित बंटवारे के कारण आपसी मतभेद नहीं होता है.

3000
मसाला पैकेट का हर दिन निर्माण
वर्ष 2013 में आजीविका मिशन में जुड़ने के बाद सखी मंडल की सदस्यों ने मसाला पैकिंग के व्यवसाय को हमेशा आगे बढ़ाने की कोशिश की. सदस्यों की सबसे बड़ी खूबी है कि मांग अधिक होने पर भी सही समय पर उचित मात्रा में मसालों की आपूर्ति निरंतर करती रहीं. धीरे-धीरे व्यवसाय बढ़ने लगा, तो सदस्यों ने पैकिंग के लिये दो मशीन भी खरीद ली. पचफोरन, गरम मसाला, ड्राई फ्रूट्स, हल्दी पाउडर आदि के पैकेट को पांच और 10 रूपये में बेचती हैं. हर दिन करीब तीन हजार पैकेट्स का निर्माण सखी मंडल की सदस्य करती हैं. गुमला क्षेत्र के सिसई के अलावा पालकोट, बिशुनपुर, भरनो आदि क्षेत्रों में इस पैकिंग को बिक्री के लिए भेजा जाता है.