aadhi aabadi

  • Jul 5 2019 5:54PM

सखी मंडल की दीदियों को डाकिया योजना से हो रही अतिरिक्त आमदनी

सखी मंडल की दीदियों को डाकिया योजना से हो रही अतिरिक्त आमदनी

 

आजीविका डेस्क

आदिम जनजातियों से जुड़ी समस्याओं को दूर करने के लिए सरकार निरंतर प्रयासरत है. इसी कड़ी में आदिम जनजाति की खाद्य सुरक्षा के लिए राज्य सरकार ने विशिष्ट जनजाति खाद्यान्न सुरक्षा योजना (पीवीटीजी डाकिया योजना) शुरू की है. ग्रामीण विकास विभाग और खाद्य, सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामले विभाग ने इस संदर्भ में एक विस्तृत मसौदा तैयार कर कैबिनेट को सौंपा था. इसके बाद राज्य सरकार ने अप्रैल 2017 को राज्य के सभी 24 जिलों के 168 प्रखंडों में निवास करनेवाले 68,731 आदिम जनजाति परिवारों के घर तक राशन पहुंचाने का निर्णय लिया. वर्तमान में इन लाभुकों की संख्या 73,386 पहुंच गयी है. इन दोनों विभागों द्वारा सम्मिलित रूप से चलायी जा रही इस योजना के तहत हर पीवीटीजी परिवार के घर तक 35 किलोग्राम चावल की बोरी पहुंचाने का प्रावधान है. इसके साथ ही संबंधित परिवारों के लिए पूर्व से चली आ रही मुख्यमंत्री खाद्यान्न सुरक्षा योजना इस नयी योजना में समाहित कर दी गयी है. वर्तमान में इस योजना के तहत कुल 73,386 लाभुकों को चावल मुहैया कराया जा रहा है. वित्तीय वर्ष 2019-20 के लिए इस योजना की अनुमानित सालाना लागत 2.83 करोड़ रुपये निर्धारित की गयी है.

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जेएसएलपीएस को मिली जिम्मेदारी
इस योजना के सुचारू व सफल क्रियान्वयन के लिए जेएसएलपीएस, ग्रामीण विकास विभाग को बोरी मुहैया कराने और पैकेजिंग की जिम्मेदारी दी गयी है. इसके लिए राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत जेएसएलपीएस द्वारा चयनित सखी मंडल की महिलाएं अपनी सेवाएं देती हैं. खाद्य, सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामले विभाग को पैकेजिंग के लिए एसएफसी का गोदाम उपलब्ध कराने और लाभुक के घर तक खाद्यान्न पहुंचाने का जिम्मा दिया गया है. इन परिवारों तक खाद्यान्न पहुंचाने की अंतिम जवाबदेही प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारियों या मार्केटिंग अफसरों को सौंपी गयी है. इसके लिए इन पदाधिकारियों को ई-पॉश मशीन मुहैया करायी गयी है.

हर महीने ढाई हजार रुपये तक होती है आमदनी
चावल की पैकेजिंग के लिए राज्यभर में लगभग 65 पैकेजिंग सेंटर स्थापित किए गए हैं. इन केंद्रों पर सखी मंडल की महिलाएं, जिनमें कुछ पीवीटीजी महिलाएं भी शामिल हैं, गुणवत्ता मानकों का पालन करते हुए पैकेजिंग करती हैं. एक केंद्र पर अमूमन छह महिलाएं काम करती हैं और हर महिला को प्रति बोरी 12 रुपये मिलते हैं. इसमें से 10 रुपये महिलाओं के निजी खाते में भेजा जाता है और शेष दो रुपये उनके ग्राम संगठन के खाते में जमा होता है. जिलावार पीवीटीजी परिवारों की जनसंख्या के आधार पर पैकेजिंग में संलग्न सखी मंडल की महिलाएं प्रतिमाह 600 से लेकर 2,500 रुपये तक कमा लेती हैं.

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समय व पैसे की बचत
डाकिया योजना से आदिम जनजाति परिवारों को कई फायदे हुए हैं. उन्हें अब हर महीने घर बैठे नियमित रूप चावल मिल रहा है. इससे समय और पैसे दोनों की बचत हो रही है. साथ ही पूर्ववर्ती जनवितरण प्रणाली व्यवस्था के तहत प्रायः कम और खराब चावल मिलने की शिकायत भी दूर हुई है. इस योजना के जरिये सही तौल के अलावा सखी मंडल की महिलाओं द्वारा पैकेजिंग करने से हर लाभुक परिवार को अच्छी क्वालिटी का चावल भी मिल रहा है. साथ ही पैकेजिंग करनेवाली महिलाओं को अतिरिक्त आमदनी भी हो रही है.

दीदियों की अतिरिक्त आमदनी
पलामू जिले के छतरपुर प्रखंड में विकास आजीविका महिला ग्राम संगठन की महिलाएं चावल पैक करती हैं. उन्हें प्रतिमाह पांच-छह दिन चावल पैक करने का काम मिल जाता है. बाकी दिन वे अपने दूसरे कामकाज करती हैं. इस काम से प्रत्येक महिला लगभग दो हजार रुपये तक हर महीने कमा लेती है, जो इन महिलाओं के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत है.

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केस स्टडी -1
पहले पानी पीकर पेट भरते थे, आज नसीब हो रहा है भोजन
लातेहार जिले के महुआडांड़ प्रखंड स्थित सिरसी गांव में बिरजिया आदिम जनजाति के लोग रहते हैं. यह गांव जिला मुख्यालय से 150 किमी की दूरी पर स्थित है. रिमझिम आजीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं 45 वर्षीय तरसीला बिरजिया इस योजना के बारे में बताते हुए कहती हैं कि पहले हमलोग भोजन के लिए पूरी तरह से जंगल पर निर्भर रहते थे. जंगल से ढूंढ़ कर लाये गये गेंठी कांदा एवं डुरू कांदा ही हमारा भोजन हुआ करता था. खेती लायक जमीन नहीं होने के कारण हम थोड़ा-बहुत मक्का की खेती कर पाते हैं. लेकिन, इस डाकिया योजना से हमें सचमुच बहुत राहत मिली है. 65 वर्षीय भजनी बिरजिया बताती हैं कि जंगल से पर्याप्त भोजन न मिलने पर हम पानी पी कर पेट भर लेते थे. आज सरकार हमें घर तक चावल ला कर दे रही है, जिससे हमें भोजन की कमी नहीं होती है.

केस स्टडी- 2
डाकिया योजना ने काफी लाभ पहुंचाया
सिमडेगा जिले के पाकरटांड़ प्रखंड अंतर्गत कैरबेड़ा पंचायत के दोभाया बिरहोर टोला में बिरहोर आदिम जनजाति के कुल 21 परिवार रहते हैं, जिन्हें डाकिया योजना का लाभ मिल रहा है. पांच परिवार जिनके पास मामूली जमीन है, वो थोड़ी-बहुत खेती करते हैं. बाकी परिवारों के लोग प्लास्टिक की रस्सी, लकड़ी का ओखल-मूसल और खटिया आदि बनाकर जैसे-तैसे जीवनयापन करते हैं. इस गांव में जनवरी 2017 में गठित एकमात्र सखी मंडल नेहा आजीविका स्वयं सहायता समूह की लेखापाल फूलमणि बिरहोर इस योजना को लेकर खासी उत्साहित हैं. कहती हैं कि हमलोग काफी गरीब हैं. आजीविका का कोई ठोस साधन नहीं होने की वजह से काफी मुश्किल से अपना गुजारा कर पाते हैं. हमें ढंग से खाने को भी नहीं मिलता था, लेकिन डाकिया योजना लागू होने से हमें काफी मदद मिली है. चूंकि चावल ही हमारा मुख्य भोजन है. इस कारण यह योजना हमारे लिए फायदेमंद है. हालांकि, बड़े परिवारों (7-8 सदस्य वाले) के लिए इतना चावल पर्याप्त नहीं है, लेकिन घर बैठे राशन मिलने से हमारी रोजी-रोटी का नुकसान नहीं होता. पहले डीलर (जन वितरण प्रणाली) द्वारा दिये जानेवाले घटिया और कम चावल की तुलना में अब हमें नियमित रूप से बेहतर क्वालिटी का चावल पूरा मिलता है.

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यह कहना गलत नहीं होगा कि अलग बस्तियों या फिर सुदूर जंगलों में रहनेवाले आदिम जनजाति के लोगों तक सरकार की इस योजना के तहत 35 किलो चावल घर-घर पहुंचाये जाने से उनकी खाद्यान्न समस्या काफी हद तक दूर हुई है. इसके साथ-साथ सखी मंडलों के इस योजना से जुड़ने से भ्रष्टाचार पर भी रोक लगी है. प्रत्यक्ष लाभ के अलावा इस योजना के सफल संचालन से अन्य लाभ भी हुए हैं. पीवीटीजी परिवारों के अंदर आत्मविश्वास का संचार हुआ है और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने में भी मदद मिली है.